नवीन गुलीया को सम्मानित करती हुई नीता अंबानी
2004 में इंटरनेट इतना ताकतवर था नहीं, जो इस काम में मेरी मदद कर सकता। इधर-उधर से जानकारी इकट्ठा करके मैंने तय किया कि मैं खुद गाड़ी चलाकर लद्दाख की मर्सिमिक ला चोटी तक जाउंगा। इसके लिए मैंने प्रायोजक ढूंढने शुरू कर दिए। मैंने वाहन कंपनियों से संपर्क साधा, काफी मशक्कत के बाद टाटा कंपनी ने मेरी पूरी तहकीकात करके अपने एसयूवी वाहन सफारी के साथ मेरी यात्रा प्रायोजित की। मैंने उन्हें निराश नहीं किया और लिम्का रिकॉर्ड बनाते हुए मात्र पचपन घंटों में वह यात्रा तय की।
मेरा रिकॉर्ड आज तक बरकरार है। यह तो थी खुद को साबित करने की प्रक्रिया। समाज के लिए काम करने की मेरी इच्छा अभी तक अधूरी थी। मुझे याद है कि स्कूल में मैंने पढ़ा था कि महात्मा गांधी हमेशा कहते थे कि काम वह करो, जिसका फायदा समाज के सबसे कमजोर वर्ग को हो। राष्ट्रपिता का यह संदेश मेरे जेहन में था, पर मैं करूं क्या, इसकी समझ तब आई, जब एक दिन गुड़गांव के एक बाजार के पार्किंग में मैंने एक दो साल की बच्ची को रोते हुए देखा।
सर्द शाम में उस बच्ची के शरीर पर एक फटा-सा कपड़ा था। मैंने उस बच्ची की सभी तात्कालिक जरूरतें पूरी करके उसके घर तक पहुंचाया। वह घटना मेरे लिए एक संदेश की तरह थी। उस दिन से मैंने समाज के तमाम जरूरतमंद बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया। मैंने 2007 में एक संस्था बनाई। मेरी संस्था अलग-अलग बच्चों की उनकी जरूरतों के हिसाब से मदद करती है, क्योंकि मैं मानता हूं कि हर बच्चे की जरूरत एक समान नहीं होती है। मैं दर्जनों बच्चों को उनकी जिंदगी बेहतर करने में अपना योगदान दे चुका हूं, उनमें पंद्रह साल का सनी भी शामिल है, जो बचपन से अपंग था। वह बच्चा आज मेधावी छात्र है और पूरे आत्मविश्वास के साथ जी रहा है। बच्चों के इतने करीब रहने के कारण मैंने कुछ किताबें भी लिखी हैं, जिनमें हौसले से भरी कविताएं और कहानियां शामिल हैं।