और वैसे भी महिलाओं पर किसी तरह का शक करने की मेरे पास कोई वजह नहीं थी। फिल्म के इंटरवल में हम दोनों सहेलियों को बेहोशी की दवा मिली कोल्ड ड्रिंक पिलाई गई। होश आने पर हमने खुद को भिवंडी के एक वेश्यालय में पाया। मेरी आंखों के सामने एक अजीब-सा अंधेरा छा गया, हमारा सौदा किया जा चुका था। मैंने वहां कई लोगों से आजादी की गुहार लगाई, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। मैंने उस नर्क से निकलने की कोशिश की, लेकिन विफल रही। बाद में मुझे मारा-पीटा गया, आंखों में मिर्च तक डाली गई।
एक साल तक ऐसे ही चलता रहा, मगर मैंने वहां से निकलने के प्रयास जारी रखे, साथ ही मैं दूसरी लड़कियों को भी बगावत के लिए उकसाती रही। वेश्यालय प्रबंधन को मेरी फितरत पता थी। दूसरी लड़कियां मेरे प्रभाव में न आएं, इसलिए उन्होंने मुझे जाने दिया। जब मैं लौटकर घर पहुंची, तो देखा कि मेरे परिवार का बुरा हाल है। मैंने जब अपनी बेटी से पूछा कि तुम्हारी मां कहां है, तो उसने कहा कि वह मर गई है। मैं भावनात्मक रूप से टूट गई और आत्महत्या के बारे में सोचने लगी, लेकिन अगले ही पल मुझे एहसास हुआ कि मेरी तरह न जाने कितनी लड़कियां है, जो वेश्यालयों में कैद हैं।
मैंने उनका जीवन बचाने का फैसला किया। मैंने पुलिस को पूरी जानकारी दी। पुलिस की शुरुआती आनाकानी के बाद मुझे स्थानीय मीडिया का साथ मिला। आखिरकार तीन मानव तस्कर पकड़े गए और उन्हें सात साल की सजा हुई। मैं यहीं संतुष्ट नहीं हुई, बल्कि एक एनजीओ और पुलिस की मदद से मैं दोबारा भिवंडी गई और वहां से तीस महिलाओं को आजाद कराया। मजदूरी करने के साथ आज मैं आंध्र प्रदेश के उन इलाकों के लोगों के बीच मानव तस्करी से बचने के लिए जागरूकता फैला रही हूं, जहां इसकी आशंका ज्यादा है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।