व्यक्तिगत स्तर पर स्टेशन की साफ-सफाई के लिए मुझे स्टेशन के अधिकारियों से अनुमति लेनी पड़ी। स्वच्छता के उद्देश्य से स्टेशन को एक तरह से गोद लेने के बाद मैं स्टेशन का बारीकी से निरीक्षण कर रहा था कि मुझे वहां गंदगी से भी बड़ी समस्या दिखी। दरअसल स्टेशन पर प्लेटफॉर्म एक से दो के बीच के गलियारे में प्रकाश की व्यवस्था काफी वक्त से दुरुस्त नहीं थी। रात को अंधेरे का फायदा उठाकर उचक्कों से यात्री हलकान रहते थे।
महिलाओं से छेड़छाड़ की घटनाएं भी सामने आईं थी। सरकारी व्यवस्था के तहत वहां उजाला किया जाए, इसके बजाय मैंने खुद ही उस गलियारे में पांच एलईडी लाइट लगा दीं। साथ ही पूरे गलियारे को साफ करके चकाचक कर दिया। दीवारों को सुंदर पेंटिंग से सजाया। किनारों पर खुशबूदार फूलों से सजे गमले रखवाए। एक झटके से पूरे गलियारे का नजारा ही बदल गया। इस काम के लिए मैंने किसी से मदद की उम्मीद नहीं की। जितना भी खर्च आया, उसे उठाया।
मेरा काम उस गलियारे तक ही सीमित नहीं रहा। मैं पिछले दो साल से हर सुबह जल्दी उठकर उरापक्कम रेलवे स्टेशन जाता हूं और वहां की गंदगी साफ करके उसे कूड़ेदान में डालता हूं। मैं अपने स्टेशन को किसी भी वक्त गंदा नहीं देखना चाहता हूं। मेरी सक्रियता से रेलवे के सरकारी मुलाजिमों में भी हरकत आई है और वे भी मेरी कोशिशों को सहारा देते रहते हैं। मेरे काम के बारे में दक्षिण रेलवे के उच्च अधिकारियों को पता चला, तो वे भी प्रभावित हुए। उन्होंने मेरे सामने सफाई के मॉडल को चेन्नई रेलवे स्टेशन पर लागू करने का प्रस्ताव रखा, जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया है।