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'मेरी सक्रियता से रेलवे के मुलाजिम भी हरकत में आए और मेरी कोशिशों को सहारा दिया'

Tue, 22 May 2018 08:53 PM IST
राजेश कन्नन यादव
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Rajesh Kannan Yadav
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भारत के अलग-अलग कोने विविधता भरे हैं। हर इलाके की अपनी खासियत है। कहीं कुछ देखने को मिलेगा, तो कहीं कुछ और। मगर कुछ चीजें ऐसी हैं, जो कमोबेश देश के हर हिस्से में सामान्य हैं। रेलवे स्टेशनों पर दिखने वाली गंदगी उन्हीं में से एक है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक गंदगी पूरे देश की शर्मनाक जागीर बन चुकी है। तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले में स्थित है उरापक्कम रेलवे स्टेशन। दैनिक यात्राओं के लिए मेरा वास्ता इसी स्टेशन से पड़ता है।

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मैं ट्रैवल टिकटिंग और मनी ट्रांसफर का काम करने वाला एक सामान्य एजेंट हूं। अतीत में कुछ वर्षों तक मैं मलयेशिया जाकर भी काम कर चुका हूं। विदेश में रहते हुए मैंने कई लोगों के मुंह से भारत की गंदगी की समस्या पर बात करते हुए सुन रखा था। अपने वर्तमान काम में भी मैंने कई फिरंगी पर्यटकों को यहां के गंदे परिवेश की शिकायत करते हुए देखा है। तीन साल पहले देश में जब स्वच्छता अभियान ने जोर पकड़ा, तो अधिकतर लोगों की तरह मुझे भी इस अभियान की सफलता पर शक हुआ।

क्योंकि मुझे पता था कि भारतीय जन इस समस्या को कभी गंभीरता से नहीं लेते। कई लोग तो इस कार्यक्रम को एक खास राजनीतिक दल का कार्यक्रम मानकर इससे किनारा कर रहे थे, मगर फिर भी मेरे दिमाग में साफ-सफाई को लेकर एक बात घर कर गई। मैंने सोचा कि भले यह राजनीतिक अभियान ही क्यों न हो, मगर इससे भला हमारे समाज का ही होगा। मैंने तय कर लिया कि मैं इस दिशा में अपने स्तर से कुछ अलग करूंगा। यह महज संयोग ही था कि मेरी निगाह में सबसे पहले रेलवे स्टेशन आया।

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व्यक्तिगत स्तर पर स्टेशन की साफ-सफाई के लिए मुझे स्टेशन के अधिकारियों से अनुमति लेनी पड़ी। स्वच्छता के उद्देश्य से स्टेशन को एक तरह से गोद लेने के बाद मैं स्टेशन का बारीकी से निरीक्षण कर रहा था कि मुझे वहां गंदगी से भी बड़ी समस्या दिखी। दरअसल स्टेशन पर प्लेटफॉर्म एक से दो के बीच के गलियारे में प्रकाश की व्यवस्था काफी वक्त से दुरुस्त नहीं थी। रात को अंधेरे का फायदा उठाकर उचक्कों से यात्री हलकान रहते थे।

महिलाओं से छेड़छाड़ की घटनाएं भी सामने आईं थी। सरकारी व्यवस्था के तहत वहां उजाला किया जाए, इसके बजाय मैंने खुद ही उस गलियारे में पांच एलईडी लाइट लगा दीं। साथ ही पूरे गलियारे को साफ करके चकाचक कर दिया। दीवारों को सुंदर पेंटिंग से सजाया। किनारों पर खुशबूदार फूलों से सजे गमले रखवाए। एक झटके से पूरे गलियारे का नजारा ही बदल गया। इस काम के लिए मैंने किसी से मदद की उम्मीद नहीं की। जितना भी खर्च आया, उसे उठाया।

मेरा काम उस गलियारे तक ही सीमित नहीं रहा। मैं पिछले दो साल से हर सुबह जल्दी उठकर उरापक्कम रेलवे स्टेशन जाता हूं और वहां की गंदगी साफ करके उसे कूड़ेदान में डालता हूं। मैं अपने स्टेशन को किसी भी वक्त गंदा नहीं देखना चाहता हूं। मेरी सक्रियता से रेलवे के सरकारी मुलाजिमों में भी हरकत आई है और वे भी मेरी कोशिशों को सहारा देते रहते हैं। मेरे काम के बारे में दक्षिण रेलवे के उच्च अधिकारियों को पता चला, तो वे भी प्रभावित हुए। उन्होंने मेरे सामने सफाई के मॉडल को चेन्नई रेलवे स्टेशन पर लागू करने का प्रस्ताव रखा, जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया है।
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