समाज के प्रति संवेदनशील तो मैं थी ही, मेरे दिमाग में ऐसे बच्चों को स्कूल पहुंचाने का ख्याल आया। दरअसल मैं एक ऐसी योजना के बारे में सोच रही थी, जिससे आगे चलकर हजारों गरीब बच्चों की जिंदगी बदल सकती थी!
अपने पहले प्रयास में ही मैंने पिता की मदद से अपने इलाके के कुल 351 बच्चों की पढ़ाई सुनिश्चित की, जिसके लिए मैंने उन सभी बच्चों की सालाना फीस जमा कर दी। यह इंतजाम मैंने शहर के तमाम दानदाताओं के माध्यम से किया था। दरअसल ऐसे कामों के लिए पैसे देने वालों की कमी नहीं है, लेकिन पारदर्शिता न होने के कारण लोग दान करने से हिचकते हैं। मैंने इसी मोर्चे पर काम किया। मैं खुद पैसे न लेकर बच्चों के फीस के नाम पर सीधे स्कूल या बच्चों के परिवार वालों के बैंक खातों में भुगतान होने वाले चेक स्वीकार करती हूं। उसके बाद जिस बच्चे को सहायता मिली है, उसकी पूरी जानकारी दानादाता से साझा करती हूं।
इससे लोगों का मुझ पर भरोसा बढ़ता गया और देखते ही देखते देश-विदेश से मदद मिलने लगी। नतीजतन मैंने अब तक दस हजार से अधिक संख्या में उन गरीब बच्चों को स्कूल पहुंचा दिया है, जो सिर्फ पैसों की वजह से नहीं पढ़ पाते। समाज में मेरी भूमिका यहीं तक सीमित नहीं है। मैं रोजाना शहर के उन अकेले 155 बुजुर्गों तक खाना पहुंचाती हूं, जिनका ख्याल रखने वाला कोई नहीं है। मुझे यह ख्याल एक बा (दादी सरीखी महिला) को सूखा भात खाते देख आया था।
मैं ऐसे बुजुर्गों के आसपास लोग ढूंढती हूं, जो पैसे लेकर समय पर उनके घरों तक खाना पहुंचा दें। इसके अलावा मैं ऐसे लोगों के संपर्क में रहती हूं, जो अपने जन्मदिन पर केक दान करते हैं। मैं अपने दस्तावेज से उन बच्चों का नाम निकालती हूं, जिनका उसी दिन जन्मदिन होता है। चंदा लेने का मेरा पारदर्शी मॉडल यहां भी लागू रहता है। मैंने पीजी की पढ़ाई कुछ ही वक्त पहले पूरी की है, पर समाज सेवा का मेरा करियर तो कब का तय हो चुका है।