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'मुझे विश्वास है कि अगर मेरे इलाके का हर एक बच्चा शिक्षित होगा, तो नक्सलवाद की समस्या खत्म हो जाएगी'

Wed, 23 May 2018 02:39 PM IST
प्रमोद पासवान
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Pramod Paswan
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करीब दो हफ्ते पहले की बात है। मेरे थाना क्षेत्र के दो स्कूलों के विलय के विरोध में कुछ ग्रामीण दो दिन से हड़ताल पर बैठे थे। उनकी मांग थी कि यह विलय रोका जाए, जिससे कुल 88 विद्यार्थियों को अपने घर से दूर जाकर न पढ़ना पड़े। मुझे लोगों से बात करने के लिए विभाग की ओर से धरना स्थल पर भेजा गया। विभागीय काम निपटाने के बाद मैंने वहां उपस्थित कुछ बच्चों को प्यार से अपने पास बुलाया और उनसे उनकी पढ़ाई के बारे में कुछ पूछताछ की।

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मुझे आश्चर्य हुआ कि वे अपनी कक्षा के हिसाब से कुछ नहीं जानते थे, खासकर गणित में वे बहुत कमजोर थे। मैंने वहीं उन बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। धरना प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों की नजर इस नजारे पर पड़ी, तो लोगों को पता चला कि इस पुलिस इंस्पेक्टर के अंदर एक मास्टर भी बसता है। मैं मूलतः झारखंड के गोड्डा जिले से हूं। मैं पहले भी पढ़ाता था, पर नब्बे के दशक में अविभाजित बिहार की सरकार ने मुझे पुलिस की नौकरी दे दी।

राज्य के कई इलाकों में काम करने के बाद फिलहाल मैं झारखंड के पूर्वी सिंहभूमि जिले के गुड़ाबांदा पुलिस थाने में तैनात हूं। सौभाग्य से मैं हमेशा से ही गणित का उम्दा विद्यार्थी रहा हूं। गणित के कठिन सूत्रों को याद रखना मेरे लिए कभी मुश्किल नहीं रहा। जब तक पढ़ाई की, मेरे सहपाठी मुझसे सलाह लेते रहते थे। लेकिन जब मैं पुलिस विभाग में चयनित हो गया, तो पुलिसिया कामकाज में मुझे अपने गणितीय ज्ञान की कोई खास जरूरत नहीं रह गई। मगर मन के एक कोने में गणित के प्रति मेरी दिलचस्पी हमेशा जिंदा रही।

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Pramod Paswan
मेरे इलाके की शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता की भी कितनी कमी है, इसका पता चलते ही मैंने तय कर लिया था कि मुझे समाज के प्रति अपनी भूमिका और अधिक विस्तृत करनी होगी। हमारे समाज में फिलहाल पुलिस की जिस तरह की छवि है, वहां किसी पुलिस वाले के लिए बच्चों को पढ़ाने के बारे में सोचना ही अजीब हो सकता है। ऊपर से दिन के अधिकांश समय लोगों की सुरक्षा में बीतने के कारण बच्चों को पढ़ाना व्यावहारिक रूप से भी आसान नहीं है।

मगर मैंने यही सोचा कि मुझे पुलिस ड्यूटी के दौरान जब भी वक्त मिलेगा मैं बच्चों को पढ़ाता रहूंगा। अच्छी बात यह रही कि कुछेक दिक्कतों के अलावा सब कुछ मेरी योजना के अनुरूप ही घट रहा है। बच्चों को मेरी पढ़ाई पसंद आने लगी है। मैंने उन्हें गणित आसानी से सीखने के तमाम तरीके सिखाए हैं। पुलिस विभाग में लोग मेरे काम की तारीफ करते हैं। इस काम की वजह से मेरी ड्यूटी पर कोई असर नहीं पड़ता है। मैं दोनों भूमिकाओं को पूरी जिम्मेदारी से निभा रहा हूं। मैंने अपने क्षेत्र के स्कूलों के कुछ शिक्षकों से भेंट की है और उन्हें गणित विषय पढ़ाने की विशेष ट्रेनिंग देने की पेशकश की है।

मुझसे पढ़ने वाले बच्चे मेरे सामने बहुत सहजता से पेश आते हैं। मेरी वर्दी में उन्हें संरक्षक की छवि नजर आती है। मुझे लगता है कि हमारे पास जो भी काबिलियत है, हमें उसे दूसरे लोगों को सिखानी चाहिए। इससे हमारी काबिलियत की सार्थकता और भी बढ़ जाती है। वैसे तो नक्सलवाद अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है, लेकिन मुझे विश्वास है कि अगर मेरे इलाके का हर एक बच्चा शिक्षित होगा, तो नक्सलवाद की समस्या पूरी तरह खत्म हो जाएगी।
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