मेरे इलाके की शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता की भी कितनी कमी है, इसका पता चलते ही मैंने तय कर लिया था कि मुझे समाज के प्रति अपनी भूमिका और अधिक विस्तृत करनी होगी। हमारे समाज में फिलहाल पुलिस की जिस तरह की छवि है, वहां किसी पुलिस वाले के लिए बच्चों को पढ़ाने के बारे में सोचना ही अजीब हो सकता है। ऊपर से दिन के अधिकांश समय लोगों की सुरक्षा में बीतने के कारण बच्चों को पढ़ाना व्यावहारिक रूप से भी आसान नहीं है।
मगर मैंने यही सोचा कि मुझे पुलिस ड्यूटी के दौरान जब भी वक्त मिलेगा मैं बच्चों को पढ़ाता रहूंगा। अच्छी बात यह रही कि कुछेक दिक्कतों के अलावा सब कुछ मेरी योजना के अनुरूप ही घट रहा है। बच्चों को मेरी पढ़ाई पसंद आने लगी है। मैंने उन्हें गणित आसानी से सीखने के तमाम तरीके सिखाए हैं। पुलिस विभाग में लोग मेरे काम की तारीफ करते हैं। इस काम की वजह से मेरी ड्यूटी पर कोई असर नहीं पड़ता है। मैं दोनों भूमिकाओं को पूरी जिम्मेदारी से निभा रहा हूं। मैंने अपने क्षेत्र के स्कूलों के कुछ शिक्षकों से भेंट की है और उन्हें गणित विषय पढ़ाने की विशेष ट्रेनिंग देने की पेशकश की है।
मुझसे पढ़ने वाले बच्चे मेरे सामने बहुत सहजता से पेश आते हैं। मेरी वर्दी में उन्हें संरक्षक की छवि नजर आती है। मुझे लगता है कि हमारे पास जो भी काबिलियत है, हमें उसे दूसरे लोगों को सिखानी चाहिए। इससे हमारी काबिलियत की सार्थकता और भी बढ़ जाती है। वैसे तो नक्सलवाद अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है, लेकिन मुझे विश्वास है कि अगर मेरे इलाके का हर एक बच्चा शिक्षित होगा, तो नक्सलवाद की समस्या पूरी तरह खत्म हो जाएगी।