आखिरकार काम करने के लिए मैंने एक ऐसी संस्था ढूंढ ली, जो इस क्षेत्र में काम कर रही थी। मुझे नए काम के लिए पिछली नौकरी से सत्तर फीसदी कम तनख्वाह मिलनी तय हुई, मगर मैंने इस बात की परवाह नहीं की, क्योंकि मुझे इस काम में संतुष्टि की उम्मीद थी। यहां काम करते हुए मुझे भारत भ्रमण का मौका मिला। इस दौरान मैं लोगों की मदद के लिए यूनिसेफ के कार्यक्रमों समेत कई अन्य अभियानों का हिस्सा बनी।
इसी तरह एक अच्छा खासा वक्त बिताने के बाद मुझे एक जरूरी बात पता चली। मैं एक तरह से स्वयंसेवक का काम कर रही थी। यह सही काम था, पर केवल इससे काम नहीं चलने वाला था। जरूरतमंदों तक उचित मदद पहुंचाने के लिए फंड इकट्ठा करना आवश्यक था। मेरे कई सलाहकारों ने मुझे बताया कि मैं समाज में यदि वास्तविक बदलाव लाना चाहती हूं, तो मुझे पैसे तो चाहिए ही। पैसे कमाने के लिए मैं दोबारा डॉक्टरी नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैंने फिर से पढ़ने का निर्णय लिया और परिवार वालों की मदद से मार्केटिंग में एमबीए पूरा किया। जल्द ही मैं एक कंपनी की सहायक निदेशक बन गई।
मैं अभी तीस साल से कम उम्र की हूं, लेकिन मैंने जिंदगी के कई सबक सीख लिए हैं। मैंने अनुभव किया है कि दूसरों की मदद करने से पहले हमें खुद को मजबूत बनाना जरूरी है। ताउम्र समझौते करने के बजाय आप अपनी निजी और सामाजिक जिंदगी में एक संतुलन बना सकते हैं। मैं फिलहाल यही कर रही हूं और खुद की जिंदगी में अपनी अहमियत को साबित करते हुए तमाम दूसरे जरूरतमंदों की मदद करती रहती हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।