इस क्रम में मुझे पता चला कि इन इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों को फोटोकॉपी-प्रिंटआउट जैसे छोटे-छोटे काम के लिए तीस-चालीस किलोमीटर दूर तक सफर करना पड़ता है और इसके लिए उनका पूरा दिन बर्बाद जाता है। इसका कारण एक ही था-इन इलाकों में बिजली की नुपलब्धता। 2013 में मैंने शहर की आरामदायक जीवन शैली छोड़कर कालाहांडी में स्थायी तौर पर रहकर काम करने का फैसला ले लिया।
मैं यहां के लोगों के लिए एक ऐसा मंच तैयार करना चाहती थी, जो इनकी समस्याओं को कुछ तो कम कर सके। इस दिशा में काफी सोचने के बाद मुझे सौर ऊर्जा एक ऐसा क्षेत्र लगा, जहां काम किया जा सकता था। यह सही है कि दुनिया का एक हिस्सा तकनीक के उच्चतम स्तर पर काम कर रहा है, और मैं लोगों की बेहद बुनियादी समस्या खत्म करने के लिए कुछ करने के बारे में आगे बढ़ रही थी। लेकिन यही छोटी तकनीक कालाहांडी के लोगों के लिए बहुत बड़ी बात थी।
संसाधनों और सहयोगियों को जुटाने के बाद मेरा पहला काम यह रहा कि मैंने एक स्थानीय युवक को गांव में जन समाधान केंद्र खोलने में मदद की। सौर ऊर्जा से संचालित एक लैपटॉप, डिजिटल कैमरा और प्रिंटर की व्यवस्था वाले इस केंद्र का मकसद था उन लोगों के लिए एक मॉडल तैयार करना, जो अपने इलाके में ऐसा काम करना चाहते हैं। मेरी आगे की यात्रा पूरी तरह सौर ऊर्जा के इर्द-गिर्द चलती रही। सौर ऊर्जा से चलने वाले बहुउद्देशीय उपकरणों की व्यवस्था करने के अलावा मैंने सैकड़ों घरों को सौर ऊर्जा से रोशन करने में मदद की। अपने सहयोगियों की मदद से मैं फिलहाल कालाहांडी इलाके में अपनी संस्था-बत्तीघर के जरिये हजारों जिंदगियों को सुलभ बनाने में जुटी हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।