अमेरिकी पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने अपने काम का दायरा पच्चीस गांवों तक बढ़ा दिया। मैंने मछुआरों को अपने साथ लेकर एक विशेष बल-सी टर्टल प्रोटेक्शन टास्क फोर्स का भी गठन किया, जिसका काम था, कछुओं के प्रजनन काल के दौरान समुद्री किनारों पर दिन-रात निगरानी रखना।
दस साल से भी ज्यादा के मेरे इस विशेष सफर का नतीजा है कि आज लाखों की संख्या में कछुओं के बच्चे अपने घर यानी समुद्र में सुरक्षित छोड़े जा चुके हैं। मौजूदा वक्त में हमारा अभियान तमिलनाडु की सीमा पार करके आंध्र प्रदेश और ओडिशा तक पहुंच चुका है, जहां हम सैकड़ों किलोमीटर लंबे समुद्री तटों पर काम कर रहे हैं। 2010 से ही हमारी संस्था आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु सरकार के वन्य जीव विभाग के साथ मिलकर काम कर रही है।
मैं समय-समय पर स्कूली बच्चों के बीच 'फ्लिपर टेस्ट' भी आयोजित करती हूं। अब तक करीब दो लाख स्कूली बच्चों तक पहुंच रखने वाले इस कार्यक्रम में पेंटिंग, क्विज, नाटक, डॉक्यूमेंटरी आदि के माध्यम से उन्हें अपनी जैव विविधता की अहमियत से अवगत कराते हैं। इसके अलावा हमने करीब पांच हजार मछुआरों को प्रशिक्षित करके अपने शोध के आधार पर उन्हें वह तकनीक मुहैया कराई है, जो उनके जाल में कछुओं को फंसने से रोकती है।
एक लंबे वक्त तक काम करने के बावजूद हमारे काम को बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया गया, लेकिन बाद में कई लोगों ने इस काम की अहमियत समझी। जब मैंने पहली बार अपने इस अनोखे कार्यक्रम की शुरुआत की थी, तब मुझे बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि मेरी कोशिशों का इतना शानदार फल मिलेगा। लेकिन अब मैं अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकती हूं कि इंसान अगर ठान ले, तो कुछ भी असंभव नहीं है।