उस महिला वाली घटना के बाद मैंने उनकी जैसी तमाम महिलाओं को काम दिलाने के लिए कंपनी में अपनी बात रखी। लेकिन कोई भी कौशल न जानने के कारण कंपनी प्रबंधन ने किसी भी महिला को काम पर रखने से मना कर दिया। मैंने तत्काल अपनी योजना में तब्दीली करते हुए यह प्रस्ताव रखा कि बेकरी का जो सामान कंपनी बाहर से मंगाती है, क्यों न उसकी जगह इन महिलाओं के हाथों का बना सामान ही उपयोग किया जाए।
बस इन्हें इस काम की शुरुआत करने के लिए मदद देनी होगी। कंपनी ने मेरी बात मान ली और जगह मुहैया करा दी। शुरुआती निवेश के बाद मैंने कंपनी के सभी सदस्यों से चंदा इकट्ठा करके 1983 में शक्ति बेकरी की शुरुआत कर दी। काम चल निकला और कई विधवा महिलाओं की जिंदगी में खुशियां लौटने लगीं।
इसके बाद तो ऐसे काम ही मेरी जिंदगी का मकसद बन गए। रिटायरमेंट के बाद भी मैं कुछ और करना चाहती थी। अपनी बेटी सरला की सलाह पर मैंने बंगलूरू के पास एक ही परिसर में एक वृद्धाश्रम और बालगृह खोलने की योजना बनाई। लेकिन हमारे पास पर्याप्त धन नहीं था। कुछ परिवर्तन के साथ एक बार फिर मैंने पुरानी तरकीब दोहराई। इस बार हमने मिलकर पिज्जा बनाना सीखा। एक बार फिर हमारा काम चल निकला।
शायद इसके पीछे हमारा नेक इरादा असल वजह हो। हमारा 'ग्रैनीज पिज्जा' आसपास के लोगों को इतना पसंद आने लगा कि लोग विभिन्न बड़े ब्रांड के पिज्जा की जगह हमारे पिज्जा को तवज्जो देने लगे। व्यापार से अर्जित लाभ से मैंने वृद्धाश्रम और बालगृह खोलने का सपना पूरा किया। मेरे आश्रम विश्रांति में आज दर्जनों बुजुर्ग तथा बच्चे रहते हैं। मैं अस्सी की उम्र पार कर चुकी हूं, लेकिन आज भी एकांउट की जिम्मेदारी खुद ही संभालती हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।