इस तरह से करीब सवा सौ बच्चों की सूची तैयार हो गई, जिन्हें मुझे हर रोज अच्छा नाश्ता कराना था। यह संख्या बड़ी थी, और मैं यह नहीं चाहता था कि नाश्ते की वजह से उनकी कक्षाएं किसी तरह प्रभावित हों। मैंने एक समय-सारिणी बनाई, जिसमें सुबह साढ़े सात से आठ बजे तक दसवीं के बच्चों को और सवा आठ से पौने नौ बजे तक दूसरे बच्चों को नाश्ता कराया जाए।
मुझे खुशी है कि मैं अपनी बचत की रकम उन बच्चों पर खर्च कर रहा हूं, जो अच्छे स्वास्थ्य के साथ आगे चलकर देश को सूद समेत वापस करेंगे। कुछ साल पहले इस स्कूल में मात्र 370 बच्चे पढ़ाई कर रहे थे। मुझे नहीं पता कि नाश्ता इसकी वजह है कि नहीं, लेकिन आज यहां बच्चों की संख्या 980 तक पहुंच गई है। छात्रों के अनुपात में शिक्षक भी बढ़े हैं और उनकी संख्या 11 से 35 हो गई है।
मेरी इस पहल का स्कूल के प्राध्यापक ने भी समर्थन किया है और वे इसी तरह का एक दूसरा प्रयोग भी शुरू करने वाले हैं। दसवीं के जो बच्चे पढ़ने में कमजोर हैं और परीक्षाओं में उनके अच्छे अंक नहीं आते हैं, वे उनके लिए अगले महीने से निःशुल्क ट्यूशन की व्यवस्था करने वाले हैं। इन सारी कवायदों से हमारे स्कूल में छात्रों की तादाद बढ़ने का क्रम जारी है। स्कूल प्रशासन भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए विभिन्न प्रकार की सुविधाओं में इजाफा कर रहा है। हाल ही में यहां सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। हमारा स्कूल अपने इलाके का पहला सरकारी स्कूल है, जहां अध्यापक और छात्र, दोनों के लिए बायोमीट्रिक उपस्थिति की व्यवस्था की गई है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।