जो दवाएं उस वक्त किसी टीबी मरीज को राहत देती थीं, आज उनमें से कई निष्प्रभावी हो चुकी हैं। चिकित्सीय जगत में यह प्रकिया चलती रहती है। इन बदलावों को समझने के लिए मैंने लागातार कई तरह के शोधों का अध्ययन किया। मुझे समझ में आ गया कि हमारी बदलती जीवनशैली का बीमारियों से गहरा रिश्ता है। मैंने भी बचपन में गंदे तालाबों में नहाया है, जिन आदतों को आज बेहद गंदी श्रेणी में रखा जाता है, पहले वे सामान्य थीं। लेकिन तब आज की तरह नई-नई बीमारियां नहीं थीं।
टीबी के कारण मरने वाले किसी भी मरीज की मौत आसान नहीं होती। मेरी देखरेख में मरने वाला हर मरीज मुझे अथाह दर्द दे जाता। लगता कि जैसे उसने मेरे गालों पर एक तेज तमाचा लगाया हो! इसी आंतरिक पीड़ा ने मुझे अस्पताल से बाहर सक्रिय होने के लिए मजबूर कर दिया। मरीजों को ठीक करने के साथ मैंने तय कर लिया कि मैं मरीजों की संख्या न बढ़े, इसके लिए भी काम करूंगा। पिछले कई वर्षों से मैं हर सार्वजनिक जगह पर लोगों को टीबी के प्रति जागरूक करने का काम कर रहा हूं। स्कूलों, धार्मिक आयोजन या फिर सार्वजनिक यातायात के अलग-अलग माध्यम हों, मेरी उपस्थिति हर जगह होती है। सौभाग्य ही था कि निजी कार की सवारी बचपन से ही मेरे नसीब में रही, लेकिन आज मैं और भी ज्यादा सक्षम होने के बावजूद लोकल रेलगाड़ियों में सफर करता हूं, ताकि सामान्य लोगों से मिलकर उन्हें स्वस्थ रहने के उपाय बता सकूं।
मैं अब तक अनगिनत लोगों से मिल चुका हूं। मेरे पास अपना माइक और स्पीकर होता है। मैं लोगों को अपना परिचय किसी डॉक्टर के रूप में नहीं, बल्कि माइकोबैक्टीरियम के तौर पर देता हूं। मैं उन्हें समझाता हूं कि आप मुझसे और एड्स जैसे मेरे दूसरे भाई-बहनों से लड़कर जीत नहीं सकते। हम बहुत ताकतवर हैं। अच्छा होगा कि आप अपनी आदतें सुधारकर हमसे दूरी बनाए रखें।