दरअसल जब हम समाज में किसी भी तरह का बदलाव लाने के बारे में सोचते हैं, तब हम इंतजार नहीं कर सकते। हमें पहला कदम खुद बढ़ाना होता है, बाकियों के साथ आने की उम्मीद तभी की जा सकती है।
सबसे पहले मैंने शहर के उन इलाकों को चिह्नित किया, जहां काम करने की अधिकतम संभावनाएं थीं। बड़े-बड़े रेस्टोरेंट और खाने की दुकानों की सूची बनाई, क्योंकि जहां ज्यादा ग्राहक, पानी की बर्बादी भी वहीं ज्यादा। मुझे पता है कि इस मामले में रेस्टोरेंट मालिकों से बड़ी भूमिका आम लोगों की है। रेस्टोरेंट्स में पानी बर्बाद करने पर कोई मनाही नहीं होती। मेरे अभियान की शुरुआत में रेस्टोरेंट मालिकों ने अच्छी प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्हें सही नहीं लगता था कि कोई आकर उनके ग्राहकों की आदत बदलने की कोशिश करे। लेकिन मैं अपने काम में जुटी रही। यही कारण है कि पिछले दो वर्षों की मेरी तपस्या के बाद आज दर्जनों रेस्टोरेंट मालिक हमारी मुहिम के साथ हैं।
मैं अपने दोस्तों के साथ मिलकर लोगों की दिमागी धारणाएं बदलने के लिए काम कर रही हूं। हमें कई अन्य संस्थाओं का समर्थन मिला है, जिनके साथ मिलकर हम दूसरे शहरों तक अपना अभियान पहुंचा चुके हैं। विभिन्न कॉलेज-स्कूलों पर आधारित मैंने दो अन्य सामाजिक समूह भी बनाए हैं, जिनके नाम हैं-चेंजमेकर्स सोसाइटी और लीड यंग। मैं कई स्कूलों में जाकर बच्चों को भी पानी बचाने की नई-नई तरकीबें सिखाती हूं। मुझे पता है कि कुछ भी अचानक नहीं बदलेगा, लेकिन यह भी पता है कि लगातार कोशिशों से बड़ा से बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।