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'मैं जिन आदिवासी इलाकों में काम कर रही हूं, वहां पैड मैन और पैड वूमन की जरूरत है'

Wed, 16 May 2018 02:35 PM IST
माया विश्वकर्मा
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आपको यकीन हो या न हो, लेकिन यह सच है कि अमेरिका में पढ़ाई करने के बावजूद मैंने 26 साल की उम्र तक कभी सैनेटरी पैड का इस्तेमाल नहीं किया था। मैं मूलतः मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले की रहने वाली हूं। एक समय था, जब मेरे घरवाले खेती-मजूदरी करके घर की जरूरतें पूरी करते थे। बावजूद इसके उन्होंने मेरी पढ़ाई से कोई समझौता नहीं किया।

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उनकी मदद और अपने हौसले से मैंने जबलपुर से बायोकेमिस्ट्री विषय से पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया। आगे चलकर मुझे दिल्ली के विख्यात एम्स अस्पताल में शोध कार्य करने का भी मौका मिला। मुझे अच्छी तरह से याद है कि अपने पहले मासिक धर्म के दौरान मेरी मामी ने मुझे कपड़ा इस्तेमाल करने के लिए कहा। स्वाभाविक था कि मुझे उनकी बात माननी थी। लेकिन गंदे कपड़े की वजह से मुझे कई तरह के संक्रमण हो गए। इस संक्रमण की पुनरावृत्ति आगे चलकर हर तीन-चार महीनों में होने लगी।

जब मैं दिल्ली में शोध कर रही थी, तो मुझे अपनी बीमारी की असल वजह पता चली। खैर, दिल्ली का काम पूरा करने के बाद मुझे सैन फ्रांसिस्को स्थित अमेरिका की प्रतिष्ठित कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में ल्यूकेमिया कैंसर पर शोध करने का अवसर प्राप्त हुआ। मैं अमेरिका गई और वहां अच्छी तरह से काम भी कर रही थी। लेकिन अमेरिका में एक कैंसर बायोलॉजिस्ट के तौर पर काम करने के बजाय अपने मुल्क में मासिक धर्म स्वास्थ्य की दिशा में काम करना मुझे बेहतर लगा, क्योंकि मैंने इस समस्या को बहुत करीब से अनुभव किया था।
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दो साल पहले अपने देश, अपने शहर में लौटने के बाद, मैंने न केवल सुरक्षित मासिक धर्म स्वास्थ्य के महत्व के बारे में लड़कियों और महिलाओं को शिक्षित करने का फैसला किया, बल्कि उन्हें सुरक्षित और प्रभावी सैनेटरी पैड भी प्रदान करने का निर्णय लिया।

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इस सिलसिले में मैंने भारत में पैडमैन के नाम से मशहूर अरुणाचलम मुरुगनाथम से भी मुलाकात की। उनके काम करने के तंत्र को देखकर मेरे मन में भी यह ख्याल आया कि सस्ते पैड बनाकर जरूरतमंद महिलाओं तक पहुंचाया जाए। इस काम के लिए मैंने कुछ पैसे अपने दोस्तों से उधार लिए और कुछ पैसों का इंतजाम क्राउड फंडिंग के जरिये किया।

इसके बाद मैंने पैड बनाने वाली मशीनें खरीदीं और दो कमरों के मकान में पैड बनाना शुरू कर दिया। चूंकि बायोलॉजिस्ट होने के नाते स्वास्थ्य से जुड़ी कई बुनियादी जानकारियां मेरे पास थीं, सो भिन्न जरूरतों के लिहाज से मैंने अलग-अलग तरह के दो विभिन्न पैड बनाने की योजना बनाई। बहुत जल्द हमारे केंद्र से प्रतिदिन हजार पैड का उत्पादन शुरू हो गया।

मैं गांवों में जाकर महिलाओं के समूहों से मिलती हूं। उन्हें पीरियड्स के बारे में बताती हूं, उनसे गंदगी से होने वाले नुकसान और समस्याओं के बारे में बता करती हूं। मैं अब तक कई हजार आदिवासी लड़कियों और महिलाओं तक सीधे पहुंच चुकी हूं। ये वही महिलाएं थीं, जिन्हें इस तरह की साफ-सफाई से कोई वास्ता नहीं था।

यह अच्छी बात है कि पैड को लेकर कई तरह के जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, फिल्म भी बनाई गई, पर जिन आदिवासी इलाकों में मैं काम कर रही हूं, वहां केवल फिल्मों से काम नहीं चलेगा। यहां जमीन पर काम करने वाले पैड मैन और पैड वूमन की जरूरत है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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