इस सिलसिले में मैंने भारत में पैडमैन के नाम से मशहूर अरुणाचलम मुरुगनाथम से भी मुलाकात की। उनके काम करने के तंत्र को देखकर मेरे मन में भी यह ख्याल आया कि सस्ते पैड बनाकर जरूरतमंद महिलाओं तक पहुंचाया जाए। इस काम के लिए मैंने कुछ पैसे अपने दोस्तों से उधार लिए और कुछ पैसों का इंतजाम क्राउड फंडिंग के जरिये किया।
इसके बाद मैंने पैड बनाने वाली मशीनें खरीदीं और दो कमरों के मकान में पैड बनाना शुरू कर दिया। चूंकि बायोलॉजिस्ट होने के नाते स्वास्थ्य से जुड़ी कई बुनियादी जानकारियां मेरे पास थीं, सो भिन्न जरूरतों के लिहाज से मैंने अलग-अलग तरह के दो विभिन्न पैड बनाने की योजना बनाई। बहुत जल्द हमारे केंद्र से प्रतिदिन हजार पैड का उत्पादन शुरू हो गया।
मैं गांवों में जाकर महिलाओं के समूहों से मिलती हूं। उन्हें पीरियड्स के बारे में बताती हूं, उनसे गंदगी से होने वाले नुकसान और समस्याओं के बारे में बता करती हूं। मैं अब तक कई हजार आदिवासी लड़कियों और महिलाओं तक सीधे पहुंच चुकी हूं। ये वही महिलाएं थीं, जिन्हें इस तरह की साफ-सफाई से कोई वास्ता नहीं था।
यह अच्छी बात है कि पैड को लेकर कई तरह के जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, फिल्म भी बनाई गई, पर जिन आदिवासी इलाकों में मैं काम कर रही हूं, वहां केवल फिल्मों से काम नहीं चलेगा। यहां जमीन पर काम करने वाले पैड मैन और पैड वूमन की जरूरत है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।