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'मैं देश को स्वच्छ और स्वस्थ बनाने के लिए सभी से भी आग्रह करती हूं कि अपने स्तर से पूरी कोशिश करें'

Tue, 15 May 2018 12:05 PM IST
बोंटी सैकिया
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Bonti Saikia
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अभी कुछेक साल पहले ही की बात है। मेरे घर में शौचालय पहले से था, इसलिए मुझे पता था कि घर में शौचालय होने का मतलब क्या होता है। लेकिन तब तक मेरे गांव के अधिकतर बाशिंदों को शौचालय के बारे में बहुत ज्यादा बातें करने की फुर्सत नहीं होती थी। इसी बीच देश में स्वच्छता अभियान ने जोर पकड़ा। देश के कोने-कोने में मेरे जैसे कई लोग इस सामाजिक अभियान को लेकर स्वाभाविक रूप से उत्साहित हो गए।

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पता नहीं क्यों, जब देश की इस बड़ी समस्या यानी गंदगी के बारे में चर्चा होती, तो मुझे असम के जोरहट का अपना इलाका सबसे बड़ा गुनाहगार दिखता। यह नैसर्गिक ही था, क्योंकि मैं अपने परिवेश में ऐसी ही चीजें देखती थी, जो स्वच्छता को खुले आम चुनौती देती थीं। खुले में शौच, बच्चे ही क्यों; बड़ों की भी गंदी आदतें, पूरी की पूरी जीवनशैली सफाई से कोसों दूर। मुझे लगा कि मैं कुछ तो कर सकती हूं। कम से कम साफ-सफाई को लेकर चलाई जा रही सरकारी योजनाओं में अपना हाथ बंटा ही सकती हूं।

मैं एक पढ़ी-लिखी महिला हूं। मुझे पता है कि शौचालय का इस्तेमाल कैसे करना है। कैसे इसे साफ रखा जाए और कैसे इसकी आदत डाली जाए। लेकिन ये सारी बातें उन ग्रामीणों को नहीं पता थीं, जिन्हें सरकारी योजना के अंतर्गत नए-नए शौचालय नसीब हुए थे। मैंने कई घरों में देखा था कि जिस तेजी से उनके यहां शौचालय बने थे, उसी तेजी में वे शौचालय बेकार भी हो गए। देखरेख की अनभिज्ञता और आदतों का दबाव इसके प्रमुख कारण रहे।

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वैसे तो भारत में जल संक्रमित बीमारियों से जितनी मौतें होती हैं, उनमें डायरिया सबसे बड़ी वजह है। और यही हाल मेरे इलाके का भी है। एक अरसे से मेरे इलाकों के कई बच्चे डायरिया का शिकार होकर मर रहे थे। यही सब देखते हुए मैंने लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करना शुरू कर दिया। मुझे पता था कि सरकारी अभियान कितने भी चला लिए जाएं, जब तक लोगों में खुद को बदलने की इच्छाशक्ति जागृत नहीं होगी, कुछ नहीं होने वाला। मैंने इसी पर काम किया।

किस तरह से लोगों को समझाया जा सकता है, इसकी जानकारी इकट्ठा की। अनेक स्वास्थ्य शिविरों में हिस्सा लेकर बीमारियों के बारे में और जाना और फिर लोगों के बीच जाने लगी। सबसे पहले तो मैं उने जुड़ी, जिनके घरों में शौचालय नहीं थे, क्योंकि ऐसे लोगों से समाज को सबसे ज्यादा खतरा होता है। उसके बाद मैंने उन घरों का रुख किया, जहां शौचालय तो थे, पर उन्हें प्रयोग करने का ढंग सही नहीं था। यहां तक कि मुझे ग्रामीणों को साबुन से हाथ धोने की बात तक बतानी पड़ी।

आसपास के गांव के स्कूलों में गई, बच्चों को स्वस्थ जीवनशैली के फायदे गिनाए। मेरे लिए यह सब करना मुश्किल तो नहीं, पर बहुत असान भी नहीं रहा। शुरू में मुझे सुनने वाले बहुत कम लोग मिले। उन्हें एक महिला, जो न तो सरकारी मुलाजिम है और न ही कोई खास हस्ती, उसे तवज्जो देने की खास वजह नहीं थी। लेकिन समाज के प्रति कुछ करने के जुनून का ही परिणाम है कि आज करीब दो हजार शौचालय बनने के साथ मेरा गांव खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त हो गया है। मैं औरों से भी आग्रह करती हूं कि देश को स्वच्छ और स्वस्थ बनाने के लिए अपने स्तर से जितना बन सके, जरूर करें।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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