इसी तरह लगभग छह महीनों तक उनके साथ मेहनत करने के बाद आखिरकार मैंने उन्हें म्यूनिसिपल स्कूल में पहुंचाने में सफलता प्राप्त कर ली। उनके साथ मेरा काम कुछ ऐसा रहा कि दस साल के बच्चे को दूसरी कक्षा में पढ़ाई करने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई, जबकि अमूमन बच्चे अपनी उम्र के हिसाब की कक्षा में पढ़ना पसंद करते हैं। स्कूल भेजने के बावजूद उनको सिखाने का मेरा काम जारी रहा।
इसके अतिरिक्त मैंने उस इलाके में कई ऐसी दुकानों की शिकायत पुलिस से की, जो गैरकानूनी तरीके से मादक पदार्थ बेचती थीं। नतीजतन बच्चों में नशा करने की दर भी कम हो गई। हालांकि इस काम में मुझे कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। दुकानदारों ने मुझे कई तरह से धमकी दी। साथ ही स्थानीय लोगों ने भी इस मामले में मेरी अपेक्षित मदद नहीं की।
मगर मैं इन चीजों से घबराई नहीं। आज की तारीख में मैं अपनी विशेष कक्षाओं के तीन सत्र चलाती हूं। पहले सत्र में तीन साल तक के बच्चे, दूसरे में उनसे बड़े बच्चे तथा तीसरे सत्र में दसवीं-बारहवीं के बच्चों की मैं पढ़ाई में मदद करती हूं। इस तरह मेरे संपर्क में कुल दो सौ बच्चे हैं। यही नहीं, मुझे देखकर दो अन्य युवतियों ने भी कुछ ऐसा ही काम अलग-अलग इलाकों में शुरू किया है। मुझे यह देखकर बहुत खुशी होती है। मैं चाहती हूं कि देश का प्रत्येक बच्चा नशे की बुराई से दूर रहे।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।