खासकर दक्षिण एशियाई देशों की, क्योंकि मुझे सबसे पहला 'बुलावा' भारत से ही मिला था। मैं थाईलैंड में थी, जब मुझे एक बिलकुल नई, पर शर्मनाक चीज दिखी। मुझे पता चला कि वहां के गरीब तबकों के बच्चों ने कभी साबुन का प्रयोग नहीं किया है। मैंने उन्हें साबुन खरीदकर दिया, तो वे साबुन खाने लगे। मेरे लिए यह नजारा देख पाना किसी दुर्घटना से कम नहीं था।
लेकिन इस दुर्घटना का फायदा यह हुआ कि मेरे दिमाग में एक विचार ने जन्म लिया, जो ऐसे कई जरूरतमंदों की मदद कर सकता था। मैंने आगे चलकर मुंबई में एक संस्था की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था-गरीबों को स्वच्छता की महत्ता बताते हुए उनके लिए निःशुल्क साबुन की व्यवस्था करना। साबुन वितरण की मेरी योजना इतनी सपाट नहीं थी। मैंने इसके लिए एक विशेष क्रम का सहारा लिया। मैंने कई पांच सितारा होटलों से संपर्क किया, उन्हें अपनी योजना के बारे में बताया।
दरअसल होटलों के कमरों में एक-दो बार प्रयोग किए जाने वाले साबुन के टुकड़ों को फेंक दिया जाता है। मेरी योजना साबुन के इन्हीं टुकड़ों का पुनर्चक्रण करके उन्हें दोबारा इस्तेमाल करने लायक बनाकर गरीबों तक पहुंचाना था। हालांकि होटलवालों ने शुरू में आनाकानी की, लेकिन बाद में वे मान गए। बहुत जल्द ही मैंने करीब दो दर्जन बड़े होटलों को अपनी संस्था से जोड़ लिया। इस्तेमाल किए गए साबुन दोबारा प्रयोग के लिए सुरक्षित रहें, इसके लिए साबुनों की ऊपरी सतह पहले तो आलू छीलने वाले चाकू से छील देते हैं, बाद में उसमें अतिरिक्त रसायन का प्रयोग करके उसे पूरी तरह प्रयोग लायक बनाते हैं।
हमारे साबुन लेबोरेटरी टेस्ट से भी गुजर चुके हैं। मेरी संस्था ने कई स्थानीय लोगों को रोजगार भी मुहैया कराया है। साबुन वितरण के वक्त बच्चे लाइन लगाकर अपनी साबुन वाली आंटी यानी मुझसे साबुन लेते हैं, उसे काफी देर तक सूंघते हैं, फिर हाथ-मुंह धोने लगते हैं, भले ही उन्हें उस वक्त इसकी जरूरत न हो।
मेरा मकसद सिर्फ जरूरतमंदों तक साबुन पहुंचाना ही नहीं है। मैं लोगों को साफ-सफाई की अच्छी आदतों के बारे में जागरूक भी करती रहती हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।