शायद यही वजह है कि गांव वालों को पक्का यकीन हो गया था कि मैं पागल हो गया हूं। जिंदगीभर की बचत इस काम में खपाने के बाद मैं धीरे-धीरे अपने रिश्तेदारों को भी खोने लगा। लेकिन इन नकली रिश्तेदारों को खोने का मुझे कोई गम नहीं था, क्योंकि मेरे नए रिश्तेदार मुझसे जुड़ने लगे थे और वे थे पेड़-पौधे तथा पशु-पक्षी, जिनकी खातिर मैं तालाब खोद रहा था। लंबे समय तक एक ही काम करने का मुझे फायदा हुआ। मुझे अनुभव हो गया कि खुदाई किस जगह करनी है।
मैं जहां भी खुदाई करता, वहां यकीनी तौर पर भू-जल स्तर ऊपर होता, जिससे तालाब के जिंदा रहने की संभावना बढ़ जाती। इन चालीस वर्षों में तालाब की जरूरतों के लिए मैंने अपनी कई भेड़ें बेची हैं। रुक-रुककर धन एकत्रित करके अगला तालाब खोदा। सबसे खास बात यह है कि सभी तालाबों को आपस में जोड़ा भी, ताकि किसी तालाब में पानी कम या ज्यादा न रहे।
जिस तरह हर दिन शरीर के लिए भोजन की जरूरत होती है, मेरे लिए अपने तालाबों को देखना भी कुछ वैसा ही है। कुछ वक्त पहले ही मेरी आंखों का ऑपरेशन हुआ है। संक्रमण से
बचने के लिए डॉक्टरों ने मुझे बाहर जाने से मना किया है। मैं फिर भी आंखें बंद करके बाहर जाता हूं, क्योंकि मुझे अपने तालाबों के एक-एक इंच का अंदाजा है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।