उन्नीस बरस की उम्र में मेरी शादी हो गई। शादी के पैंतालीस दिनों बाद मैं बीमार हो गई। मुझे डॉक्टर के पास ले जाया गया, तो डॉक्टर ने जिस बीमारी का नाम लिया, उससे मेरे ससुराल वालों के होश उड़ गए। मैं अपने पति के संक्रमण से एचआईवी पॉजिटिव हो चुकी थी।
मेरे पति और उसके परिवार ने शादी से पहले किसी को इस बीमारी के बारे में कुछ नहीं बताया था और इसी धोखे ने मुझे एचआईवी संक्रमण से ज्यादा परेशान किया। चंद महीनों के भीतर ही मेरे पति की एड्स की वजह से मृत्यु हो गई। मैं बीस साल की उम्र में ही विधवा हो चुकी थी।
मेरे साथ इससे भी बुरा तब हुआ, जब ससुराल वालों ने संपत्ति पर हक की आशंका में मुझे अपने घर से भी निकाल दिया। मैं तमिलनाडु के नमक्कल से ताल्लुक रखती हूं। एचआईवी की दहशत के बीच विधवा होने का दंश, ऐसी जिंदगी जीना भला कौन पसंद करेगा!
तमाम नकारात्मकता के बीच मैंने खुद को संभालते हुए तय किया कि मैं हार मानकर बैठने के बजाय दुनिया के सामने अपनी आवाज उठाऊंगी। मेरी लड़ाई की पहली जरूरत यह थी कि मैं एचआईवी संक्रमित होने की पहचान सार्वजनिक करूं। भारत में नब्बे के दशक में किसी महिला के लिए यह काम इतना आसान नहीं था।
इस बीमारी के बारे में जागरूकता बेहद कम, जबकि अफवाहें चरम पर थीं। संभवतः मैं उस वक्त देश की पहिला महिला थी, जिसने अपने एचआईवी संक्रमण की पहचान सार्वजनिक की। मेरा यह साहस राष्ट्रीय सुर्खियों में शामिल हुआ, जिसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मैंने ससुराल की संपत्ति में अपना हक हासिल करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी, ससुराल वालों को अदालत तक ले गई। व्यक्तिगत मुद्दों के बाद मेरी नजर एचआईवी संक्रमित व्यक्तिओं, विशेषकर महिलाओं की सामाजिक स्थिति बेहतर करने पर गई।