मगर समाज के इसी व्यवहार ने मां के प्रति मेरी इज्जत और बढ़ा दी। मां की मदद करने के लिए ही मैं सोलह साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ कर काम करने लगा। समय के साथ मैंने नौकरी में तरक्की हासिल की और एक मुझे बड़ी विज्ञापन कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई। ट्रेन वाली घटना रोज दफ्तर जाने के क्रम में घटित हुई। उस दिन के बाद मैंने ट्रेनों में महिलाओं को छेड़ने वालों को सबक सिखाने की ठान ली।
मैंने और मेरे एक दोस्त ने थोड़ी खोजबीन शुरू की, तो पाया कि ऐसे सैकड़ों पुरुष हर जगह मौजूद थे और 85 फीसदी से ज्यादा ट्रेनों में सफर करने वाली औरतों को ऐसी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। किसी भी मनचले को पुलिस के हवाले करने के लिए मुझे साक्ष्य की जरूरत थी, जिसके लिए शुरू में मैंने अपने मोबाइल कैमरे का प्रयोग किया। लेकिन मोबाइल से रिकॉर्डिंग करना हर बार व्यावहारिक नहीं था।
मैंने तकनीक का सहारा लिया, ऐसे चश्मे खरीदे, जो एक बेहतर कैमरे से लैस थे। मैं ट्रेन के डिब्बे के एक कोने में खड़ा रह कर ऐसी आपराधिक गतिविधि को रिकॉर्ड करने लगा। फिर कानून की मदद के लिए पुलिस के सामने अपनी पूरी बात रखी। अच्छी बात यह रही कि पुलिस ने मेरे नेक मकसद को सकारात्मक तरीके से लिया। नतीजा यह निकला कि मेरी रिकॉर्डिंग के आधार पर अगले स्टेशन पर उन अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस तैयार मिलती।
इस तरह छह महीने में मैंने करीब डेढ़ सौ मनचलों को उनकी गलती की सजा दिलाई। मैं औरतों की बहुत इज्जत करता हूं, जिसकी शुरुआत मेरे अपने घर से हुई। अपने परिवार की महिला सदस्यों के प्रति दी जाने वाली इज्जत का एक अंश भी यदि हम बाहरी महिलाओं के लिए लागू करें, तो चीजें बदल जाएं। यही बात लोग अपने बेटों को समझाएं, ताकि दुनिया में महिलाओं का शोषण करने वाले पुरुषों की संख्या कम हो सके।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।