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'गुरुकुल खोलने का मकसद गरीब परिवार के बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराना था'

Thu, 20 Sep 2018 06:17 PM IST
गुणाशेखरन
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गुणा शेखरन
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उस स्वतंत्रता दिवस पर जिला समाज कल्याण अधिकारी हमारे इंजीनियरिंग कॉलेज में बतौर मुख्य अतिथि आई थीं। उन्हीं मोहतरमा के जरिये हमारा संपर्क एक वृद्धाश्रम से हुआ। हम हफ्ते में एक बार वहां जरूर जाने लगे। कुछ समय बाद हमें पता चला कि वृद्धाश्रम को दूसरी जगह स्थानांतरित किया जा रहा है। इस बाबत आश्रम के संचालकों ने हमसे मदद मांगी। वे चाहते थे कि हम दूसरे आश्रम के लिए किराये की रकम इकट्ठा करने में उनकी मदद करें। तब मैं अपनी इंजीनियरिंग के दूसरे साल में था।

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मैंने छात्रावास में अपने साथियों और कॉलेज के कुछ पुराने छात्रों की सामूहिक मदद से करीब पचास हजार रुपये इकट्ठा किए। इस रकम से वृद्धाश्रम संचालकों ने इरोड शहर के बाहरी इलाके में जमीन खरीद ली। इस सफलता के बाद हमारी टीम ने दूसरे इंजीनियरिंग कॉलेज में भी अपनी मुहिम चलाई और एक लाख रुपये से ऊपर धनराशि एकत्रित कर ली, जिसका उपयोग आश्रम भवन बनाने में किया गया। अगले साल मैंने अपने कॉलेज के प्रिंसिपल से आग्रह किया कि वह एक अन्य संस्था की भी मदद करें।

प्रिंसिपल ने हमारे प्रस्ताव को यह कहकर नकार दिया कि इस सरकारी कॉलेज में कई छात्र अपनी फीस तक नहीं भर पाते। इन्हीं गरीब छात्रों के लिए उसी वर्ष मैंने अपना छात्र कल्याण समूह गठित किया और 75 हजार रुपये इकट्ठा कर जरूरतमंद छात्रों की फीस जमा करने में मदद की। स्नातक करने के बाद मैंने करीब सौ पूर्व छात्रों की टीम के साथ मिलकर और अधिक छात्रों की मदद करने के उद्देश्य से स्माइल वेलफेयर फाउंडेशन की स्थापना की।

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मेरी टीम के सभी सदस्य अपने-अपने पेशे में सक्रिय थे। इसी संस्था के अंतर्गत पिछले तेरह वर्षों से कई परियोजनाएं चल रही हैं। 'पुन्नागई पालम' यानी मुस्कान का पुल ऐसी ही परियोजना है। इसके तहत सुशिक्षित व सफल स्वयंसेवी सरकारी अनाथालयों के बच्चों को अतिरिक्त कोचिंग प्रदान करते हैं। इस काम की शुरुआत में हमने देखा कि किसी भी बालगृह का पूरा माहौल अच्छे या बुरे वार्डन पर निर्भर करता है। और इस कमी को दूर करने के लिए सरकारी ताकत ही एकमात्र विकल्प है।

व्यवस्था में शामिल होने के लिए मैंने आठ साल पहले प्रशासनिक सेवाओं में जाने की तैयारी की, पर ऐसा हो नहीं सका, जिसके बाद मैं कोयंबटूर की एक आईएएस अकादमी में पढ़ाने लगा। बाद में मैं अपने इरोड शहर के उस कोचिंग संस्थान से जुड़ गया, जो गरीब छात्रों को निःशुल्क कोचिंग देता था। कुछ वक्त बाद मैंने वहां से भी इस्तीफा देकर साबरमती गुरुकुलम खोला, जिसका मकसद छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के साथ नौकरी न मिलने पर भी उन्हें आजीविका कमाने लायक तैयार करना है।

दरअसल एक बड़ी जनसंख्या के मुकाबले सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या को देखते हुए यह संभव नहीं है कि हर किसी को नौकरी मिले। तैयारी करना काफी खर्चीला काम होता है। गरीब परिवारों के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती होती है। इन्हीं कारण मैंने अपना गुरुकुल खोला था। दक्षिण भारत के इस साबरमती गुरुकुल में जैविक खेती-किसानी समेत तमाम अन्य कौशल भी सिखाए जाते हैं। हालांकि इस गुरुकुल का हिस्सा बनने के लिए छात्रों को कुछ पैसा जरूर खर्च करना पड़ता है, पर रहने-खाने समेत सभी सुविधाओं के लिए मात्र दो हजार रुपये का मासिक खर्च तुलनातम रूप से बहुत कम है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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