मेरी टीम के सभी सदस्य अपने-अपने पेशे में सक्रिय थे। इसी संस्था के अंतर्गत पिछले तेरह वर्षों से कई परियोजनाएं चल रही हैं। 'पुन्नागई पालम' यानी मुस्कान का पुल ऐसी ही परियोजना है। इसके तहत सुशिक्षित व सफल स्वयंसेवी सरकारी अनाथालयों के बच्चों को अतिरिक्त कोचिंग प्रदान करते हैं। इस काम की शुरुआत में हमने देखा कि किसी भी बालगृह का पूरा माहौल अच्छे या बुरे वार्डन पर निर्भर करता है। और इस कमी को दूर करने के लिए सरकारी ताकत ही एकमात्र विकल्प है।
व्यवस्था में शामिल होने के लिए मैंने आठ साल पहले प्रशासनिक सेवाओं में जाने की तैयारी की, पर ऐसा हो नहीं सका, जिसके बाद मैं कोयंबटूर की एक आईएएस अकादमी में पढ़ाने लगा। बाद में मैं अपने इरोड शहर के उस कोचिंग संस्थान से जुड़ गया, जो गरीब छात्रों को निःशुल्क कोचिंग देता था। कुछ वक्त बाद मैंने वहां से भी इस्तीफा देकर साबरमती गुरुकुलम खोला, जिसका मकसद छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के साथ नौकरी न मिलने पर भी उन्हें आजीविका कमाने लायक तैयार करना है।
दरअसल एक बड़ी जनसंख्या के मुकाबले सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या को देखते हुए यह संभव नहीं है कि हर किसी को नौकरी मिले। तैयारी करना काफी खर्चीला काम होता है। गरीब परिवारों के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती होती है। इन्हीं कारण मैंने अपना गुरुकुल खोला था। दक्षिण भारत के इस साबरमती गुरुकुल में जैविक खेती-किसानी समेत तमाम अन्य कौशल भी सिखाए जाते हैं। हालांकि इस गुरुकुल का हिस्सा बनने के लिए छात्रों को कुछ पैसा जरूर खर्च करना पड़ता है, पर रहने-खाने समेत सभी सुविधाओं के लिए मात्र दो हजार रुपये का मासिक खर्च तुलनातम रूप से बहुत कम है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।