मैंने अपनी सभी भूमिकाओं को अपने शत-प्रतिशत प्रयासों से निभाने की कोशिश की है। ड्यूटी को सबसे ऊपर रखने का ही परिणाम है कि मैंने अपने संपूर्ण करियर में एक भी छुट्टी नहीं ली। फिर चाहे वह साप्ताहिक अवकाश हो, चिकित्सा अवकाश हो या अर्जित अवकाश।
इस अभ्यास के बाद लाजिमी था कि मेरे परिवार पर इसका असर पड़े। लेकिन मेरी पत्नी ने हमेशा मेरा साथ दिया। बच्चों को पालने में मेरी जिम्मेदारी भी उसी ने उठाई। मैंने बच्चों को बढ़ते नहीं, बल्कि बस बड़ा हुए ही देखा, यह कहूं तो झूठ नहीं होगा। मेरे तीनों बच्चों ने बेहतरीन तालीम हासिल की और फिलहाल अपने-अपने जीवन साथियों के साथ देश-विदेश में अच्छे से रह रहे हैं। मेरी इस लगातार ड्यूटी के लिए अच्छी सेहत का साथ बेहद जरूरी था। मैं इस मामले में बहुत संयमी व्यक्ति हूं। नाश्ते से लेकर रात के खाने तक, मेरे लिए खाने में सब कुछ तय है। पैंसठ की उम्र पार करने के बावजूद आज भी हर दिन एक लीटर छाछ या मट्ठा मेरी पहली जरूरत है। मैं हर दिन पांच किलोमीटर दौड़ता हूं और योग-व्यायाम पर भी ध्यान देता हूं।
पुलिस की नौकरी करते हुए मैंने हमेशा अपने पिता के सिद्धांतों का पालन किया है। छह साल हो गए मुझे रिटायर हुए, मगर मेरा काम करने का उत्साह आज भी जारी है। मैं आज भी अपने विभाग में ही बिना वेतन लिए बतौर इंचार्ज ड्यूटी कर रहा हूं। यह अपने ऊपर मेरा विश्वास ही है कि मैंने लिखकर दे दिया है, जब तक सांस है; बिना रुके, बिना थके, बिना गैरहाजिर हुए ड्यूटी करता रहूंगा।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।