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'रिटायरमेंट के छह साल बाद भी जारी है ड्यूटी'

Wed, 19 Sep 2018 06:08 PM IST
बलजीत सिंह राणा
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बलजीत सिंह राणा
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मैं उस दिन दिल्ली घूमने आया था। यहां घूम ही रहा था कि पता चला कि एक जगह पुलिस की भर्ती चल रही है। मेरी शुरुआती पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और नौकरी के लिए भाग्य आजमाने में मेरे लिए कोई विशेष दिक्कत भी न थी। मैं पुलिस भर्ती के लिए लगी कतार में खड़ा हो गया। जल्द ही मेरा चयन भी हो गया। और इस तरह घूमने के लिए आए शहर में मुझे नौकरी मिल गई।

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मेरा ताल्लुक हरियाणा के सोनीपत जिले के एक गांव से है। मैं अपने तीन भाई-बहनों में दूसरे स्थान पर हूं। दो साल पहले रिटायर होने से पहले मेरे छोटे भाई भी दिल्ली पुलिस में सब इंस्पेक्टर रह चुके हैं। दिल्ली में यदि किसी भी स्तर के पुलिस वाले की पोस्टिंग राष्ट्रपति भवन या संसद के इर्द-गिर्द हो जाए, तो बहुत से लोग इसे सजा के तौर पर देखते हैं। पर जब 1973 में मेरी पहली पोस्टिंग राष्ट्रपति भवन के सुरक्षा दस्ते के सदस्य के तौर पर हुई, तो मुझे यह सम्मान सरीखा लगा। मैंने हमेशा से ड्यूटी को अहमियत दी और पोस्टिंग कहां हुई, इसे मुद्दा नहीं बनाया। 1976 में मुझे पदोन्नति मिली और मुझे हवलदार का रुतबा प्रदान करते हुए संसद भवन थाने में स्थानांतरित कर दिया गया।

वहां मेरी ड्यूटी थोड़ी खास किस्म की थी। तत्कालीन पुलिस उपायुक्त ने मुझे 'डिप्लॉयमेंट सेल' का मुखिया बना दिया। 'डिप्लॉयमेंट सेल' में तैनात पुलिस कर्मी चौबीसों घंटे ऑन ड्यूटी रहता है। इसके तहत विदेशी मेहमानों की सुरक्षा और रूट निर्धारण, रोज होने वाले धरना-प्रदर्शनों को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराना तथा सुरक्षा बलों की व्यवस्था आदि का काम होता है। यहां किसी छोटी-सी गलती की भी गुंजाइश नहीं होती।

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मैंने अपनी सभी भूमिकाओं को अपने शत-प्रतिशत प्रयासों से निभाने की कोशिश की है। ड्यूटी को सबसे ऊपर रखने का ही परिणाम है कि मैंने अपने संपूर्ण करियर में एक भी छुट्टी नहीं ली। फिर चाहे वह साप्ताहिक अवकाश हो, चिकित्सा अवकाश हो या अर्जित अवकाश।

इस अभ्यास के बाद लाजिमी था कि मेरे परिवार पर इसका असर पड़े। लेकिन मेरी पत्नी ने हमेशा मेरा साथ दिया। बच्चों को पालने में मेरी जिम्मेदारी भी उसी ने उठाई। मैंने बच्चों को बढ़ते नहीं, बल्कि बस बड़ा हुए ही देखा, यह कहूं तो झूठ नहीं होगा। मेरे तीनों बच्चों ने बेहतरीन तालीम हासिल की और फिलहाल अपने-अपने जीवन साथियों के साथ देश-विदेश में अच्छे से रह रहे हैं। मेरी इस लगातार ड्यूटी के लिए अच्छी सेहत का साथ बेहद जरूरी था। मैं इस मामले में बहुत संयमी व्यक्ति हूं। नाश्ते से लेकर रात के खाने तक, मेरे लिए खाने में सब कुछ तय है। पैंसठ की उम्र पार करने के बावजूद आज भी हर दिन एक लीटर छाछ या मट्ठा मेरी पहली जरूरत है। मैं हर दिन पांच किलोमीटर दौड़ता हूं और योग-व्यायाम पर भी ध्यान देता हूं।

पुलिस की नौकरी करते हुए मैंने हमेशा अपने पिता के सिद्धांतों का पालन किया है। छह साल हो गए मुझे रिटायर हुए, मगर मेरा काम करने का उत्साह आज भी जारी है। मैं आज भी अपने विभाग में ही बिना वेतन लिए बतौर इंचार्ज ड्यूटी कर रहा हूं। यह अपने ऊपर मेरा विश्वास ही है कि मैंने लिखकर दे दिया है, जब तक सांस है; बिना रुके, बिना थके, बिना गैरहाजिर हुए ड्यूटी करता रहूंगा।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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