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'दसवंद की सीख का पालन करने के लिए टैक्सी में अपनी सवारियों को मुफ्त नाश्ता कराता हूं'

Thu, 26 Jul 2018 05:04 PM IST
संत सिंह उर्फ गोल्डी सिंह
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संत सिंह उर्फ गोल्डी सिंह
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सिख धर्म मानने वालों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी कमाई का दसवां हिस्सा (दसवंद) परोपकार के लिए खर्च करेंगे। और यह खर्च किसी भी तरीके से किया जा सकता है। मैं दसवंद की सीख का पालन अपने हिसाब से करता हूं। मैं दिल्ली की सड़कों पर टैक्सी चलाता हूं। मेरी टैक्सी में बैठने वाली कोई भी सवारी पानी, कोल्ड ड्रिंक, लेमन सोडा, चिप्स, चाय, कॉफी आदि का निःशुल्क सेवन कर सकती है। लोगों की सेवा में कुछ ऐसे ही खर्च होता है, मेरी कमाई का दसवां हिस्सा।

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दरअसल कुछ वक्त पहले तक मैं एक इंजीनियर था। घरों में विद्युत उपकरण फिट करना मेरा काम था। एक दिन काम करते हुए (एयर कंडिशनर की फिटिंग के दौरान) मैं छत से नीचे गिर गया। पीठ में ऐसी चोट आई कि डॉक्टरों ने हमेशा के लिए भारी सामान उठाने को मना कर दिया। घर पर काफी समय तक आराम किया, तो कई अन्य तरह की दिक्कतें शुरू हो गईं। यदि सात लोगों के परिवार में इकलौता कमाऊ शख्स बिस्तर पर पड़ा हो, तो समस्याएं कब तक घर की दहलीज के बाहर रहेंगी! दुर्घटना की वजह से मेरे परिवार की माली हालत पर बहुत बुरा असर पड़ा। मैं अपनी शारीरिक हालत के मुताबिक काम की तलाश करने लगा। मेरी तलाश टैक्सी चलाने के विचार पर खत्म हुई। यह एक ऐसा काम था, जिसमें बहुत अधिक शारीरिक श्रम नहीं करना था।

शुरू में मैंने किराए की टैक्सी चलाई। चूंकि हर रोज मुझे गाड़ी का भाड़ा भी जमा करना होता था, सो ज्यादा आमदनी के लिए कई-कई दिनों तक घर नहीं लौटता। अथाह मेहनत करने के बावजूद इतनी कमाई नहीं होती थी, जिससे परिवार की सम्मानजनक आर्थिक स्थिति बहाल हो सके। यह देखते हुए मेरी मां ने अपनी बचत के पूरे पैसे मुझे देकर एक पुरानी टैक्सी खरीदने में मेरी मदद की।

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मुझे अब किसी को पैसे नहीं देने थे, लेकिन फिर भी मैंने अतिरिक्त समय पर काम करना नहीं छोड़ा। जल्द ही मेरी मेहनत का नतीजा दिखने लगा और सब कुछ पटरी पर आ गया। परिस्थितयां चाहे जैसी भी रही हों, मैं कभी भी अपनी कमाई का दसवां हिस्सा सेवा के लिए अलग रखना नहीं भूला। फिर चाहे दिनभर में महज सौ रुपये ही क्यों न कमाए हों।

इसी बीच मेरे दिमाग में ख्याल आया कि क्यों न मैं अपना दसवंद लंगर खिलाने में खर्च करूं। लेकिन मेरे जैसे टैक्सी ड्राइवर के पास लंगर का इंतजाम करने के लिए जरूरी वक्त निकालना मुश्किल था। टैक्सी में सवारियों को खिलाने-पिलाने की व्यवस्था की शुरुआत यहीं से हुई। मैं अपनी सवारियों का सत्कार बिल्कुल वैसे ही करता हूं, जैसे घर में किसी मेहमान की आवभगत की जाती है। गाड़ी में बैठते ही मैं उन्हें पानी की पेशकश करता हूं, उसके बाद वे चाहें, तो चाय या दूसरी खाने-पीने की चीजें भी ले सकते हैं। अधिकांश यात्री मेरे इस व्यवहार पर हैरत जताते हैं। लेकिन पूरी बात समझने पर वे मेरी प्रशंसा करते हैं। कुछ लोग तो मेरे साथ सेल्फी भी खींचते हैं।

उनकी प्रशंसाओं से मुझे और बेहतर करने की प्रेरणा मिलती है। मैं यही मानता हूं कि इंसान की जिंदगी किसी दूसरे के काम न आए, तो उसका कोई मतलब नहीं है। मैं एक यूट्यूब चैनल भी चलाता हूं, जिस पर विभिन्न तरह के प्रेरणादायक वीडियो पोस्ट करता हूं। चूंकि मैं इंजीनियरिंग का काम भी कर चुका हूं, इसलिए मैंने घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों से संबंधित कुछ वीडियो साझा किए हैं।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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