वैसे तो भारत में जल संक्रमित बीमारियों से जितनी मौतें होती हैं, उनमें डायरिया सबसे बड़ी वजह है। और यही हाल मेरे इलाके का भी है। एक अरसे से मेरे इलाकों के कई बच्चे डायरिया का शिकार होकर मर रहे थे। यही सब देखते हुए मैंने लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करना शुरू कर दिया। मुझे पता था कि सरकारी अभियान कितने भी चला लिए जाएं, जब तक लोगों में खुद को बदलने की इच्छाशक्ति जागृत नहीं होगी, कुछ नहीं होने वाला। मैंने इसी पर काम किया।
किस तरह से लोगों को समझाया जा सकता है, इसकी जानकारी इकट्ठा की। अनेक स्वास्थ्य शिविरों में हिस्सा लेकर बीमारियों के बारे में और जाना और फिर लोगों के बीच जाने लगी। सबसे पहले तो मैं उने जुड़ी, जिनके घरों में शौचालय नहीं थे, क्योंकि ऐसे लोगों से समाज को सबसे ज्यादा खतरा होता है। उसके बाद मैंने उन घरों का रुख किया, जहां शौचालय तो थे, पर उन्हें प्रयोग करने का ढंग सही नहीं था। यहां तक कि मुझे ग्रामीणों को साबुन से हाथ धोने की बात तक बतानी पड़ी।
आसपास के गांव के स्कूलों में गई, बच्चों को स्वस्थ जीवनशैली के फायदे गिनाए। मेरे लिए यह सब करना मुश्किल तो नहीं, पर बहुत असान भी नहीं रहा। शुरू में मुझे सुनने वाले बहुत कम लोग मिले। उन्हें एक महिला, जो न तो सरकारी मुलाजिम है और न ही कोई खास हस्ती, उसे तवज्जो देने की खास वजह नहीं थी। लेकिन समाज के प्रति कुछ करने के जुनून का ही परिणाम है कि आज करीब दो हजार शौचालय बनने के साथ मेरा गांव खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त हो गया है। मैं औरों से भी आग्रह करती हूं कि देश को स्वच्छ और स्वस्थ बनाने के लिए अपने स्तर से जितना बन सके, जरूर करें।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।