लोग अपने बच्चों को हमारे पास भेजने को राजी ही नहीं थे। जिन दो-चार बच्चों के साथ हमने अपना कार्यक्रम शुरू भी किया, उनका भावनात्मक स्तर एकदम जुदा था। मैं सामान्य बच्चों से बात करने का अभ्यस्त था। पर उन बच्चों ने बहुत कम उम्र में दुनिया की इतनी बुराइयां देख रखी थीं कि उनके लिए बुराइयों की परिभाषा ही बदल चुकी थी। पांच साल का बच्चा भी ऐसी बातें करता, जो हमारी दुनिया में बड़े लोग भी न कर पाएं।
प्यार-दुलार जैसी बुनियादी मानवीय व्यवहार से उनका दूर-दूर तक रिश्ता नहीं था। 2012 में केंद्र खोलने के अगले दो वर्षों तक हमें काफी परेशानी हुई। 2014 से हमने विधिवत अपना काम शुरू कर दिया। सबसे पहले एक-एक दरवाजे तक जाकर मैंने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि हम उनके बच्चों की बेहतरी के लिए काम करना चाहते हैं। धीरे-धीरे ही सही, हमारे केंद्र पर बच्चों का आना शुरू हो गया। मैं अपनी टीम के साथ उन बच्चों को सामान्य पढ़ाई के साथ योग, ध्यान व दूसरी जरूरी गतिविधियों से परिचित कराने लगा। बीतते वक्त के साथ हमारे काम का अच्छा परिणाम दिखने लगा।
मेरी सबसे बड़ी सफलता यही रही कि इन बदनाम गलियों के करीब दो सौ बच्चे, जिनके दिमाग में सपनों का भी टोटा रहता है, आज मुख्यधारा की जिंदगी के बारे में सोच रहे हैं। मेरे पास उन्हें आगे तक ले जाने की भी योजना है। मेरी टीम उन लोगों के पुनर्वास के लिए भी काम करती है, जो सोनागाछी की गलियों में रिटायर हो चुके हैं। महज चालीस वर्ष की उम्र में 'बेकार' हो जाने वाले ऐसे लोगों की समस्या और भी ज्यादा है। मैं तो यह चाहता हूं कि सोनागाछी की पूरी पहचान ही बदल जाए, लेकिन इसके लिए हर उस शख्स को सोचना होगा, जो वहां जाते हैं और बिना ऐसा कुछ सोचे वापस लौट आते हैं।