हालांकि इलाके के पंचायत विकास अधिकारियों को किसी भी संभावित भू-स्खलन के बारे में पहले से अंदेशा था, लेकिन मेरे इनपुट के बाद उन्होंने तुरंत कार्रवाई की और सभी एहतियाती कदम उठाए गए, जिसमें उस जगह के लोगों को दूसरी जगह ले जाया गया। इस बचाव कार्य में कम से कम पंद्रह परिवार के लोगों को बचाया गया। यह घटना करिके गांव की है। उस दिन मैं इसी गांव में बाढ़ का दंश झेल रहे ग्रामीणों की मदद करके ही वापस लौटा था।
वहां काम करते हुए मुझे इसका अंदाजा नहीं था कि यहां से मेरे जाते ही मुझे एक ऐसा वीडियो देखने को मिलेगा, जिसमें धरती के भीतर की भयानक आवाजें सुनाई देगीं। मिट्टी की आवाजें पहचानना मैंने कुछ साल पहले सीखा है। तिरुवनंतपुरम में आयोजित नेशनल सेंटर फॉर अर्थ साइंस स्टडीज की एक कार्यशाला में मुझे यह जानने का मौका मिला। मैंने इन आवाजों का गहन अध्ययन करने के लिए अलग-अलग इलाकों के नदी तटों का दौरा किया है।
ये आवाजें मिट्टी की उथल-पुथल की द्योतक हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो इन्हें भारी भू-स्खलन की चेतावनी के तौर पर लिया जा सकता है। उन परिवारों के लोगों को यदि समय पर वहां से नहीं निकाला जाता, तो उनमें से शायद ही कोई व्यक्ति सही-सलामत बचता, क्योंकि कुछ वक्त बाद लोगों ने प्रत्यक्ष अपनी आंखों से अपने घरों को जमींदोज होते देखा है। मैं मानता हूं कि मैंने कोई बड़ा काम नहीं किया है। मैंने बस अपना कर्तव्य निभाते हुए प्रशासन की मदद से कुछ लोगों को बचाया है, जिसके लिए मेरा तजुर्बा काम आया। नहीं, तो करिके गांव में भी वही घटना घटती, जो पास के मदिकेरी गांव में घटी थी।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आाधारित।