आगे चलकर मैं यहीं की एक परियोजना का मुखिया बन गया। चूंकि मैं एक किसान परिवार से आता हूं, इसलिए खेती और इससे जुड़ी खबरों से मेरा वास्ता पड़ता रहा है। मुझे पता है कि राज्य में हर साल सैकड़ों किसान बारिश पर निर्भरता और कर्ज के कुचक्र में फंसकर खुदकुशी कर लेते हैं। मैंने इसी समस्या को ध्यान में रखकर कोई समाधान निकालने की सोची। इस दिशा में क्या कुछ किया जा सकता है, यह जानने के लिए इंटरनेट पर घंटों बिताए।
इसी दरम्यान मेरे एक जीवविज्ञानी मित्र, जो कि काम के सिलसिले में अमेरिका तक जा चुके हैं, ने मुझे एक सलाह दी। उन्होंने मुझे एक नई तरह की खेती-'एक्वापोनिक्स' के बारे में बताया। इस तरीके की खेती में आम तौर पर लगने वाले पानी के महज दस फीसदी पानी की मदद से पौधे दोगुनी रफ्तार से बढ़ते हैं। मछलियों और पौधों को मिलाकर की जाने वाली खेती के बारे में मैंने कुछ किसानों को बताया। उनसे बात करने के बाद मुझे अंदाजा हो गया कि वे मेरी बात इतनी आसानी से नहीं मानने वाले हैं। मुझे उन्हें मनाने के लिए पहले परिणाम दिखाना था।
मुझे एक तरकीब सूझी। मैंने किसानी करने वाले उन बच्चों को विश्वास में लेना शुरू किया, जो डेफी में पढ़ने आते थे। इसके लिए मैंने बाकायदा एक छोटा एक्वापोनिक्स सेटअप तैयार किया। मेरी कवायद का असर दिखने लगा, जब कुछ किसान मेरा सेटअप देखने आने लगे। वहां हो रही विशेष खेती के नमूने देखने के बाद उन्होंने उस तंत्र को अपनाने के लिए हामी भर दी। जल्द ही मैंने तरानीरू नाम से अपना स्टार्टअप शुरू कर दिया। इसके तहत मैं किसानों को एक्वापोनिक्स खेती के लिए प्रोत्साहित करता हूं। मैं उन किसानों की बेहतरी के लिए काम करना चाहता हूं, जो हमारा पेट भरते हैं और जिनके बिना हमारे अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।