ग्वालियर में लोहा व्यवसायिक संघ के मुखिया राकेश लहारिया इस बंद के आयोजकों में से एक हैं। उन्होंने इस विरोध प्रदर्शन की प्लानिंग के बारे में बीबीसी को बताया, "ये सभी दलित विरोधियों का प्रदर्शन है। उनकी वजह से हमारा नुकसान हुआ है। कल हम फोन पर पूरे शहर को बंद करने की कोशिश करेंगे। शहर में धारा-144 लगी है। कानून हम नहीं तोड़ेंगे।"
राम नारायण मिश्रा और राकेश लहारिया, दोनों ने ही दावा किया कि उन्हें किसी राजनीतिक पार्टी का समर्थन प्राप्त नहीं है। ऐसे में इस बंद के मकसद और इसके हासिल को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। ग्वालियर में वरिष्ठ पत्रकार नवीन नायक ने बताया कि फिलहाल शहर में सवर्णों और दलितों के बीच बंटवारा तो साफ देखा जा सकता है।
नवीन नायक ने कहा, "दो अप्रैल को जब दलितों ने भारत बंद का आयोजन किया था तो दोनों पक्षों के बीच कई जगह सीधी टक्कर हुई थी।" "इस हिंसा में तीन दलित मारे गए। इसके बाद सवर्ण समूह ने प्रचार किया कि शहर का माहौल शांतिपूर्ण था और इसे बिगाड़ने के लिए
दलित समाज जिम्मेदार है।" "अब इसे बड़े पैमाने पर देखें तो चंबल और भिंड संभाग में भी कमोबेश यही स्थिति है।" अन्य स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि दो अप्रैल की हिंसा के बाद हालांकि पुलिस ने कोई जाति आधारित आंकड़ें जारी नहीं किए हैं। लेकिन ग्वालियर, भिंड, मुरैना जैसे शहरों में दोनों ही पक्षों के लोगों की गिरफ्तारी की गई है। ग्वालियर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉक्टर आशीष ने बीबीसी को बताया कि मंगलवार को वैसे भी ग्वालियर शहर के दो तिहाई बाजार बंद होते हैं।
"फिर भी शहर में 2,000 अतिरिक्त फोर्स तैनात की जाएगी। झुंड में लोग दिखे तो उन्हें निर्देशों का उल्लंघन करने के जुर्म में ग्वालियर सेंट्रल जेल भेजा जाएगा। ग्वालियर में हिंसा प्रभावित इलाकों में पांच थानों में पांच हजार से ज्यादा लाइसेंसी हथियार जमा कर लिए गए हैं।" मध्य प्रदेश में मंगलवार को बुलाए गए बंद को जातियों के शक्ति प्रदर्शन के तौर पर भी देखा जा रहा है। जमीनी स्थिति ये है कि ऐसे शक्ति प्रदर्शन प्रशासन ही नहीं कई शहरों की शांति व्यवस्था के लिए चुनौती की वजह बन गए हैं। स्थानीय लोगों में ये भी चिंता है कि कुछ शहरों में 20 अप्रैल तक धारा-144 लागू होने के बावजूद कहीं आंबेडकर जयंती और उसके बाद परशुराम जयंती पर तनाव बढ़ न जाए।