उमरिया के बांधवगढ़ में जन्माष्टमी पर साल में सिर्फ एक दिन पहाड़ी मंदिर के पट खुलते हैं। यहां भगवान श्रीराम को कृष्ण और माता सीता को राधारानी के रूप में पूजा जाता है। मेले में 135 अधिकारी-कर्मचारी सुरक्षा संभालेंगे।
देशभर में जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की धूम रहती है। मंदिरों में कान्हा की झांकियां सजाई जाती हैं, भजन-कीर्तन होते हैं और आधी रात को भगवान के जन्म के साथ उत्सव चरम पर पहुंचता है। लेकिन उमरिया जिले के बांधवगढ़ में जन्माष्टमी की परंपरा कुछ अलग है। यहां बाघों के बसेरे और घने जंगल के बीच पहाड़ की चोटी पर स्थित सदियों पुराने श्रीराम-जानकी मंदिर के पट साल में सिर्फ एक दिन श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। खास बात यह है कि जन्माष्टमी पर भगवान श्रीराम को कान्हा और माता सीता को राधारानी के रूप में पूजने की परंपरा चली आ रही है।
ताला गांव से करीब 15 किलोमीटर दूर बांधवगढ़ की ऊंची पहाड़ी पर ऐतिहासिक किला और उसके भीतर स्थित बंधवाधीश मंदिर श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। सामान्य दिनों में यह क्षेत्र श्रद्धालुओं के प्रवेश के लिए प्रतिबंधित रहता है। हालांकि, कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष अनुमति के साथ मंदिर के पट खोले जाते हैं। जंगल के बीच पहाड़ी की चढ़ाई, चारों ओर हरियाली और वन्यजीवों की मौजूदगी इस धार्मिक यात्रा को सामान्य मंदिर दर्शन से अलग अनुभव बनाती है।
राजा के वचन से जुड़ी परंपरा आज भी कायम
1970 के दशक में बांधवगढ़ को टाइगर रिजर्व का स्वरूप मिलने के बाद जंगल में सामान्य आवागमन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बावजूद जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालुओं को विशेष व्यवस्था के तहत मंदिर तक पहुंचने का अवसर मिलता है। इस दिन जंगल का शांत वातावरण घंटियों, भजनों और श्रद्धालुओं की आस्था से गूंज उठता है।
राम को कान्हा मानकर होती है पूजा
बांधवगढ़ किले से जुड़ी धार्मिक मान्यता भी बेहद रोचक है। कहा जाता है कि भगवान श्रीराम ने वनवास से लौटने के बाद यह किला अपने भाई लक्ष्मण को उपहार में दिया था। इसी कारण इसका नाम बांधवगढ़ पड़ा, जिसका अर्थ भाई का किला माना जाता है। इसी धार्मिक विरासत के बीच जन्माष्टमी पर श्रीराम-जानकी मंदिर में भगवान राम को कृष्ण स्वरूप में पूजना यहां की विशिष्ट परंपरा है।
135 अधिकारी-कर्मचारी संभालेंगे मेले की व्यवस्था
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की क्षेत्रीय संचालक अनुपम सहाय ने बताया कि जन्माष्टमी मेले के दौरान करीब 135 अधिकारी, कर्मचारी और श्रमिक तैनात रहेंगे। सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए करीब 29 प्रमुख ड्यूटी प्वाइंट बनाए गए हैं। संवेदनशील स्थानों पर छह जिप्सी वाहन तत्काल सहायता के लिए तैनात रहेंगे। इसके अलावा हाथियों के माध्यम से भी जंगल क्षेत्र में गश्त की जाएगी।
श्रद्धालुओं को केवल ताला गेट से प्रवेश दिया जाएगा। प्रवेश पत्रों की जांच के बाद ही उन्हें आगे जाने की अनुमति मिलेगी। मुख्य गेट पर चिकित्सा दल, आवश्यक दवाइयां, स्ट्रेचर और आपातकालीन सुविधाएं उपलब्ध रहेंगी। ताला गेट से मंदिर तक जाने वाले मार्ग में जरूरी सुधार कार्य भी कराए गए हैं।
वन्यजीवों की सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों और 65 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों को पहाड़ी मंदिर क्षेत्र में जाने की अनुमति नहीं होगी। उनके लिए ताला गेट के बाहर बड़ी स्क्रीन पर मंदिर के दर्शन की व्यवस्था की जाएगी। इस तरह बांधवगढ़ की जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण के जन्म का पर्व नहीं, बल्कि राम, कृष्ण, जंगल और सदियों पुरानी राजपरंपरा के अनूठे संगम का उत्सव बन जाती है। बाघों के इस साम्राज्य में साल में एक दिन खुलने वाला मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था, रोमांच और इतिहास से जुड़ा खास अनुभव बन जाता है।