उमरिया कभी बांधवगढ़ के जंगलों से विलुप्त हो चुका गौर अब एक बार फिर यहां के जंगलों की पहचान बनता जा रहा है। बड़े शाकाहारी वन्यजीवों के संरक्षण और पुनर्स्थापना के प्रयासों के बीच बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में गौर के कुनबे में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वर्ष 2011-12 में कान्हा से लाए गए 50 गौर अब बढ़कर लगभग 170 तक पहुंच चुके हैं।
1998 में जंगल से हो गया था गायब
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक अनुपम सहाय के अनुसार गौर, जिसे भारतीय बायसन भी कहा जाता है, एशिया का सबसे बड़ा जंगली गौवंश है। बांधवगढ़ में गौर वर्ष 1998 में स्थानीय स्तर पर विलुप्त हो गया था। इसके बाद इन्हें दोबारा बांधवगढ़ के जंगलों में बसाने की योजना तैयार की गई।
वर्ष 2011-12 में कान्हा टाइगर रिजर्व से 50 गौर बांधवगढ़ लाए गए और पुनर्स्थापना की प्रक्रिया शुरू हुई। अनुकूल वातावरण और संरक्षण प्रयासों के बीच इनकी संख्या में वृद्धि हुई और यह आंकड़ा लगभग 170 तक पहुंच गया।
सतपुड़ा से भी आया नया जेनेटिक पूल
गौर की आबादी को लंबे समय तक स्वस्थ बनाए रखने के लिए केवल संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं माना जाता। आनुवंशिक विविधता बनाए रखना भी जरूरी है। इसी उद्देश्य से सतपुड़ा क्षेत्र से भी गौर को बांधवगढ़ में लाने के प्रयास किए गए हैं। इससे यहां मौजूद आबादी में नया आनुवंशिक आधार जुड़ने की उम्मीद है।
वन विभाग के अनुसार, गौर जैसे बड़े शाकाहारी वन्यजीव जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके चरने से वनस्पतियों की वृद्धि और फैलाव की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित होती है, जबकि ये जंगल की खाद्य शृंखला का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
गौर और वन भैंसा एक नहीं
अक्सर गौर और वन भैंसे को उनके बड़े आकार और काले शरीर के कारण एक जैसा समझ लिया जाता है, लेकिन दोनों अलग-अलग प्रजातियां हैं। इनके आवास, शारीरिक संरचना और खान-पान में भी अंतर पाया जाता है। गौर मुख्य रूप से घास, पत्तियां और वनस्पतियों पर निर्भर रहने वाला वन्यजीव है।
संरक्षण की कहानी में नया अध्याय
बांधवगढ़ में गौर की वापसी केवल एक प्रजाति के संरक्षण की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि उचित संरक्षण, वैज्ञानिक प्रबंधन और अनुकूल आवास मिलने पर किसी क्षेत्र से गायब हो चुकी वन्यजीव प्रजाति को फिर से स्थापित किया जा सकता है। कभी 1998 में बांधवगढ़ से गायब हुआ गौर आज लगभग 170 के कुनबे तक पहुंच चुका है। जंगल में बढ़ता यह कुनबा संरक्षण की उस कोशिश की कहानी बयां कर रहा है, जिसमें विलुप्ति के बाद वापसी संभव हुई है।