विराट संत सम्मेलन का दादागुरु के समक्ष स्वामी परमानंद, स्वामी शांतिस्वरूपानंद, स्वामी ज्योतिमर्यानन्द गिरि, स्वागताध्यक्ष महावीर प्रसाद मानसिंगा सहित संतों ने दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया। संत सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए युगपुरुष महामंडलेश्वर श्रीस्वामी परमानंद गिरि ने कहा कि संत सम्मेलन छोटा-बड़ा नहीं होता है। हां पंडाल छोटा-बड़ा हो सकता है।
उन्होंने कहा, प्रवचन और विचारों की महत्ता छोटी नहीं होती। संत जहां एकत्रित होते हैं, वह स्थान पवित्र और महत्वपूर्ण होता है। गुरुजी ने कहा, जब हम मिट्टी को पहचान लेते हैं तो उससे बनी हुई चीजें भी मिट्टी ही दिख जाती हैं। दुनिया में कोई काम कठिन नहीं है, जो तुमसे नहीं हो सकता। चाह कठिन है, हम मन से तैयार नहीं होते। हमें जो चाहिए, हम वो ही देखते हैं। किसी को स्वप्न में गुरु दिखते हैं, किसी को धन संपदा दिखती है, कई सांसारिक सुख भोगते हैं, ये देखना कठिन भी है। हमें स्वप्न नहीं बदलना है, जीवन बदलना है, जीवन बदलेंगे स्वप्न अपने आप बदलने लगेंगे।
विराट संत सम्मेलन के संरक्षक चारधाम के पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी श्री शांतिस्वरूपानंद गिरि ने मंच पर आसीन सभी संतों का परिचय कराते हुए ब्रह्मलीन दादागुरु के दर्शन, जीवन शैली पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संतों के सानिध्य में बैठो, भटकना बंद हो जाएगा। हमें जगत से भागना नहीं, जागना है। कार्यक्रम में स्वागत भाषण कार्यक्रम के अध्यक्ष विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा ने दिया। कार्यक्रम का संचालन कार्यक्रम समिति के अध्यक्ष अशोक प्रजापत और कमलेश पंचोली ने किया।
इस दौरान श्रीस्वामी महामंडलेश्वर अनन्तदेव गिरि महाराज (वामनदेव ज्योर्तिमठ, वृन्दावन), महामंडलेश्वर श्रीस्वामी जगत प्रकाश महाराज (चित्रकूट), स्वामी महेशानंद (हरिद्वार), महामंडलेश्वर दिव्यचेतना दीदी (हरिद्वार श्रीस्वामी वेदानन्द महाराज (वृन्दावन), स्वामी सत्यश्रेयगिरि महाराज (वृन्दावन), साध्वी चैतन्य सिंघु (इन्दौर), साध्वी साक्षी (ओंकारेश्वर), महामंडलेश्वर स्वामी परमानंद महाराज, महामण्डलेश्वर श्रीस्वामी ज्योतिमर्यानन्द गिरि महाराज (हरिद्वार) उपस्थित रहे। कार्यक्रम में विष्णु प्रसाद बिंदल, तरुण मित्तल, डॉ. पुरुषोत्तम व्यास, डॉ. सुशील गुप्ता सहित बड़ी संख्या में भक्तगण मौजूद रहे।