अश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि से नवरात्र प्रारंभ हो चुके हैं। इस अवसर पर जानिए सिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक उज्जैन में विराजमान माता हरसिद्धि की महिमा। हरसिद्धि मां सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी भी हैं, जहां रोजाना हजारों की संख्या में भक्त दर्शन लाभ लेने पहुंचते हैं। महाकालेश्वर मंदिर जाने वाले भक्त हरसिद्धि मां के दर पर आशीर्वाद लेने जरूर पहुंचते हैं।
मंदिर के पुजारी राजू पुरी गोस्वामी बताते हैं कि माता सती के अंग जो अलग-अलग स्थानों पर गिरे थे, उनमें से एक अंग उज्जैन में भी गिरा। जहां माता सती की दाहिनी कोहनी शिप्रा नदी किनारे गिरी थी, तभी से भगवान शिव ने यहां शक्तिपीठ के रूप में माता का स्थान स्थापित किया, जिन्हें आज हम सभी हरसिद्धि माता के नाम से जानते हैं। वहीं शिव जी का ज्योतिर्लिंग महाकाल रूप में मंदिर से 200 मीटर की दूरी पर विराजमान है। मंदिर में मां हरसिद्धि देवी महालक्ष्मी और देवी महासरस्वती की प्रतिमाओं के मध्य हैं। यहां यंत्र भी प्रतिष्ठित है। तांत्रिक परंपरा में इस स्थान को सिद्धपीठ माना गया है।
राजा विक्रमादित्य ने किए थे शीश अर्पण
स्कंद पुराण में उल्लेख है कि प्रचण्ड राक्षस नामक दैत्यों का संहार करने के कारण देवी का नाम हरसिद्धि प्रसिद्ध हुआ। लोक परंपरा अनुसार माता हरसिद्धि को सम्राट विक्रमादित्य की कुलदेवी भी बताया गया है। कहते हैं सम्राट विक्रमादित्य ने यहां पर अपने शीश अर्पित कर हरसिद्धि रूप में विराजमान देवी महालक्ष्मी एवं महासरस्वती को प्रसन्न किया था। तेहरवीं शताब्दी के ग्रंथों में हरसिद्धि माता मंदिर का उल्लेख मिलता है। वर्तमान मंदिर मराठाकालीन है।
ऐसा है मंदिर
हरसिद्धि मंदिर में चार प्रवेश द्वार हैं। मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व की तरफ है। गेट के चारों तरफ गुंबददार संरचनाएं बनाई गई हैं। इसके अलावा एक कुआं भी है, जिसके अंदर एक स्तंभ भी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, स्तंभ दीप जलाते समय बोली गई मनोकामना मां हरसिद्धि पूरी करती हैं।
यह चढ़ता है प्रसाद
मंदिर में भक्त मां हरसिद्धि को लड्डू, इलायची और बर्फी का भोग अर्पित करते हैं, जिसके बाद लोगों में प्रसाद का वितरण किया जाता है।
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51 फीट ऊंचे स्तम्भ में लगते हैं प्रतिदिन दीप
ऐसी मान्यता है कि उज्जैन में हर 12 वर्ष में अकाल पड़ता था, जिसे दूर करने के लिए उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने सभी देवियों को प्रसन्न किया। इसी वजह से यहां माता का प्रकोप कम है। उज्जैन में शांति बनी रहने का यही एक कारण है कि सभी भक्तों पर माता का आशीर्वाद बना रहता है। मंदिर में स्थापित 51 फीट ऊंचे 1100 दीपों के दो दीप स्तम्भ हैं, जिन्हें जलाने में एक बार में 60 लीटर तेल की आवश्यकता होती है और चार किलो रुई की।
सालभर में 4 नवरात्रि, इनमें दो गुप्त नवरात्रि
मंदिर के पुजारी राजेश गोस्वामी बताते हैं कि साल भर में चार नवरात्रि होती हैं। एक आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, कुंवार अश्विन माह की और माघ मास की नवरात्रि। सभी का अपना महत्व है। इसमें देवियों के मंदिर में पूजा 9 दिन तक अलग-अलग स्वरूप में की जाती है। भक्तों का तांता मंदिर में लगा रहता है।
नवरात्रि में नहीं होगी शयन आरती
हरसिद्धि मंदिर में नवरात्रि के दौरान देवी की शुद्ध सात्विक शाक्त पूजा की जाती है। नवरात्रि के इन नौ दिनों में माता को विशेष रूप से अनार के दाने, शहद और नवरात्रि की पूर्णाहुति पर अदरक का भोग लगाया जाता है। चूंकि माता हरसिद्धि नौ दिनों तक शयन नहीं करतीं, इसलिए इन दिनों शयन आरती नहीं की जाती है।