एक कुत्ते कल्लू के मरने की अफवाह कल्लू नाम के आदमी के मर्डर में बदल जाती है, जिससे गैंगवार शुरू हो जाता है। इसी बीच में एक अधूरी प्रेम कहानी भी शुरू हो जाती है। सब मिलाकर कुछ ऐसा होता है कि मरने कि इस अफवाह के मामले में लोग गमगीन होने और शोक मनाने की बजाय हंस-हंसकर लोटपोट हो जाते हैं। परिष्कृति संस्था द्वारा दो दिवसीय हास्य नाट्य समारोह के अंतर्गत कालिदास अकादमी में ‘बात का बतंगड़’ नाटक की प्रस्तुति की गई। सतीश दवे द्वारा लिखे तथा निर्देशित नाटक ने दर्शकों को बहुत गुदगुदाया।
नाटक की कहानी काल्पनिक शहर पर आधारित थी, लेकिन इसमें एक कुत्ते कल्लू के मरने की अफवाह के साथ ही लव स्टोरी से दर्शक नाटक में खो जाता है। इस नाटक में सड़क पर बैठे जानवरों की समस्या हो या ऊंचे ऊंचे स्पीड ब्रेकर के चुटीले व्यंग्य ने भी वर्तमान को जीवित कर देती है। नाटक में भिया (सुदर्शन स्वामी), बल्लम (झलक दत्ता), ट्रैक्टर (हर्ष गोयल) और डंफर (ऋषि वर्मा) के सशक्त अभिनय ने नाटक में जान डाल दी। कैंची (रौनक शाक्य), दद्दा (शिरीष सत्यप्रेमी), कजरी (वर्षा जाट), उस्तरा (प्रिंस नागवंशी) ने अपने-अपने किरदारों को बखुबी निभाया। कल्लू (महेश गोस्वामी), जूही (नीला शर्मा), फावडा़ (रौनक वर्मा), दंराता (प्रियांशु नागवंशी), रामपुरिया (शशिधर नागर), काकी (सावी शर्मा) और छोटू (प्रणव बैंडवाल) का अभिनय भी लाजवाब था। कसी हुई कथा और बेहतरीन निर्देशन ने दर्शकों को स्वस्थ मनोरंजन के साथ नया संदेश भी दिया। नाटक के दो गाने भी मजेदार थे। यह सतीश दवे की एक सशक्त प्रस्तुति थी।