भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान कृष्णमाचारी श्रीकांत ने आज प्रातःकाल भस्म आरती में भगवान श्री महाकालेश्वर जी के मंदिर में दर्शन लाभ लिया। भगवान महाकालेश्वर का पूजन-अर्चन पुजारी आकाश गुरु द्वारा विधि-विधान से कराया। इस अवसर पर श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति की ओर से भस्म आरती प्रभारी आशीष दुबे ने उनका सम्मान किया। श्रीकांत ने मंदिर में व्यवस्थाओं की सराहना करते हुए भगवान महाकाल से देशवासियों की सुख-समृद्धि एवं कल्याण की कामना की।
महाकालेश्वर मंदिर के सहायक प्रशासक मूलचंद जूनवाल ने बताया कि भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान श्रीकांत आज सुबह अपने परिवार के सहित बाबा महाकाल के दर्शन करने और भस्म आरती देखने मंदिर पहुंचे थे, जहां आपने लगभग 2 घंटे तक बाबा महाकाल के निराकार से साकार स्वरूप के दर्शन किए। बाबा महाकाल के दर्शन के दौरान श्रीकांत पारंपरिक वेशभूषा धोती कुर्ता में नजर आए, जबकि उनकी पत्नी ने भी इस दौरान साड़ी पहन रखी थी। भस्म आरती के दौरान हाथ जोड़कर बाबा महाकाल की भक्ति की और माथे पर तिलक भी लगवाया। बाबा महाकाल के दर्शन करने के बाद आपने मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि मैं पहली बार बाबा महाकाल की भस्म आरती देखने आया हूं यहां आकर मुझे काफी अच्छा लगा। मैंने भस्म आरती के बारे में काफी सुन रखा था, लेकिन आज यहां पर जो पॉजिटिव एनर्जी देखने को मिली ऐसा एहसास मुझे कभी नहीं हुआ।
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पेशे से इंजीनियर थे श्रीकांत
उस दौर में भारत के पास एक स्वाभाविक रूप से आक्रामक सलामी बल्लेबाज था, जो कुछ ही ओवरों में विपक्ष की पार्टी को बिगाड़ सकता था। पेशे से इंजीनियर, श्रीकांत ने भारत के चेन्नई में प्रतिष्ठित कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, गिंडी से स्नातक किया। श्रीकांत की बल्लेबाजी शैली स्टेडियम में जमा भीड़ के लिए अभिनव और मनोरंजक दोनों थी। बल्लेबाजी के लिए उनका दृष्टिकोण उनके जोड़ीदार सुनील गावस्कर के बिल्कुल विपरीत था, क्योंकि इस जोड़ी ने भारत के लिए कुछ बेहतरीन शुरुआत की। खेल के प्रति श्रीकांत का दृष्टिकोण तूफानी था, लेकिन साथ ही खतरों से भरा भी था। इसके परिणामस्वरूप कई सस्ते आउट हुए और श्रीकांत ने खुद को अक्सर पक्ष से बाहर पाया। 21 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में पदार्पण करते हुए, श्रीकांत एक स्टाइलिश सलामी बल्लेबाज थे, जिन्हें अच्छे हाथ-आंख समन्वय और कुछ बेहद तेज प्रतिक्रियाओं का उपहार मिला था। 1983 के विश्व कप फाइनल के दौरान उनकी आक्रामक प्रकृति स्पष्ट थी, जब उन्होंने भारतीयों के लिए 38 रनों की शानदार पारी खेली थी। वह 1985 में बेन्सन एंड हेजेस विश्व चैंपियनशिप ऑफ क्रिकेट जीतने वाली टीम का एक प्रमुख सदस्य भी थे। श्रीकांत के लिए निरंतरता कभी भी मूलमंत्र नहीं रही और वह उत्कृष्ट और हास्यास्पद के बीच बदलते रहे। उन्हें 1989 में कप्तान बनाया गया और उन्होंने भारत को पाकिस्तान में एक विश्वसनीय श्रृंखला ड्रॉ कराई। हालांकि, बल्ले से खराब फॉर्म के कारण उन्हें टीम से निकाल दिया गया था। उन्होंने 1991 में वापसी की, लेकिन उम्र के साथ उनकी सजगता भी धीमी हो गई थी।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उनका आखिरी प्रदर्शन ऑस्ट्रेलिया दौरा और उसके बाद 1992 का विश्व कप था। 1993 में उन्हें दक्षिण क्षेत्र की टीम के लिए नहीं चुना गया और उन्होंने 33 साल की उम्र में क्रिकेट को अलविदा कह दिया उन्होंने 1988 में विशाखापत्तनम में न्यूजीलैंड के खिलाफ यह उपलब्धि हासिल की थी। अपने संन्यास के बाद से श्रीकांत का भारत 'ए' के कोच के रूप में सफल करियर रहा है। वह विभिन्न टीवी चैनलों पर प्रसारक और विशेषज्ञ विश्लेषक भी रहे हैं।श्रीकांत ने भारत के लिए 43 टेस्ट मैच खेले, जिसमें उन्होंने 29.88 के स्वीकार्य औसत से 2,062 रन बनाए। उनकी शैली एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों के लिए अधिक उपयुक्त थी, जहाँ उन्होंने 29.01 के अच्छे औसत से 4,091 रन बनाकर 146 मैचों का काफी बेहतर रिकॉर्ड संकलित किया। उन्होंने एकदिवसीय मैचों में नियमित रूप से ऑफ स्पिन गेंदबाजी भी की, जिसमें उन्होंने 25.64 के बहुत अच्छे औसत से 25 विकेट लिए उनके बेटे, अनिरुद्ध श्रीकांत एक उभरते हुए क्रिकेटर हैं और तमिलनाडु रणजी टीम का हिस्सा हैं। श्रीकांत को 2008 में चेन्नई सुपर किंग्स (सीएसके) का आइकन नियुक्त किया गया था उनका कार्यकाल 2011 विश्व कप के साथ समाप्त हो गया, लेकिन भारत के लिए एक सफल अभियान के कारण उन्हें कार्यकाल विस्तार दिया गया।