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टीकमगढ़ में मिलीं 815 प्राचीन पांडुलिपियां: 10 फीट लंबी हस्तलिखित प्रति बनी आकर्षण, खोज पर शोधकर्ताओं की नजर

Sat, 11 Jul 2026 07:24 AM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, टीकमगढ़

सार

Tikamgarh: टीकमगढ़ में ज्ञान भारतम मिशन के तहत 815 प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियां मिली हैं। इनमें 10 फीट लंबी पांडुलिपि, जम्बूद्वीप का प्राचीन नक्शा और ज्योतिषीय ग्रंथ शामिल हैं। डिजिटलीकरण के बाद इनके अध्ययन से भारतीय ज्ञान परंपरा के नए तथ्य सामने आने की उम्मीद है।
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815 प्राचीन पांडुलिपियां, - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियों का महत्वपूर्ण संग्रह सामने आया है। ज्ञान भारतम मिशन के तहत जिले के विभिन्न जैन मंदिरों और प्राचीन स्थलों से अब तक 815 हस्तलिखित पांडुलिपियां चिन्हित की गई हैं। इनका डिजिटलीकरण किया जा रहा है, ताकि भविष्य में विशेषज्ञ इनके संरक्षण और अध्ययन का कार्य कर सकें। माना जा रहा है कि इन पांडुलिपियों के अध्ययन से भारतीय दर्शन, ज्योतिष, भूगोल, चिकित्सा और संस्कृति से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर नई जानकारी मिल सकती है।

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इनमें सबसे अधिक आकर्षण करीब 10 फीट लंबी हस्तलिखित पांडुलिपि और जम्बूद्वीप के प्राचीन नक्शे का है। विशेषज्ञों के अनुसार यह नक्शा जैन परंपरा और भारतीय ब्रह्मांड विज्ञान में वर्णित जम्बूद्वीप की संरचना को दर्शाता है। इसमें मेरु पर्वत, विभिन्न द्वीपों, समुद्रों और क्षेत्रों का सूक्ष्म एवं कलात्मक चित्रण किया गया है। साथ ही कई स्थानों के नाम भी अंकित हैं, जो प्राचीन भारतीय भूगोल और धार्मिक परंपराओं के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

ज्ञान भारतम मिशन से जुड़े अनूपम दीक्षित ने बताया कि केंद्र सरकार के निर्देश पर पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण किया जा रहा है। हालांकि यहां आंकड़ों में अंतर है। खबर के अनुसार 815 पांडुलिपियां खोजी गई हैं, जबकि आगे 825 पांडुलिपियों के ऑनलाइन होने का उल्लेख है। यदि आधिकारिक आंकड़ा 825 है तो उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 234 पांडुलिपियों को भारत ज्ञान मंडल की ओर से अनुमोदित किया गया है। डिजिटलीकरण के बाद इतिहासकार, पुरातत्वविद और शोधकर्ता इनका विस्तृत अध्ययन करेंगे।

ये पांडुलिपियां जिले के लिधौरा, कुंडेश्वर, बाजार जैन मंदिर, नया जैन मंदिर, श्री पार्श्वनाथ जैन मंदिर, बजरंग फड़ाखोह, दिगंबर जैन मंदिर समेत अन्य धार्मिक स्थलों से प्राप्त हुई हैं। इनमें धर्म, दर्शन, चिकित्सा, ज्योतिष, गणित, भूगोल और सामाजिक जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण ग्रंथ शामिल हैं।


इसके अलावा ज्योतिषीय गणना से संबंधित एक दुर्लभ पुस्तक और उसके साथ मिला पारंपरिक लकड़ी का पासा भी शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। माना जा रहा है कि प्राचीन काल में इसका उपयोग ज्योतिषीय गणनाओं में किया जाता था। विशेषज्ञों का मानना है कि इन दुर्लभ दस्तावेजों के अध्ययन से भारतीय ज्ञान-विज्ञान की समृद्ध परंपरा के अनेक नए तथ्य सामने आएंगे और टीकमगढ़ पांडुलिपि अध्ययन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में पहचान बना सकता है।
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क्या बोले इतिहासकार?

इतिहास के जानकार विजय मेहरा कहते हैं...

अधोलोक का स्पष्ट चित्रण: नक्शे में दाईं ओर नीचे स्पष्ट रूप से देवनागरी लिपि में "अधोलोक का नक्शा" और "त्रस नाड़ी" लिखा हुआ है। जैन दर्शन के अनुसार, त्रसनाड़ी वह केंद्रीय ऊर्ध्वाधर स्तंभ है जिसके भीतर सभी गतिशील जीव (त्रस जीव) निवास करते हैं।

स्वास्तिक और चंद्र चिह्न: नक्शे के गोलाकार क्षेत्रों और कोनों में 'स्वास्तिक' (卐) और अर्धचंद्र के पवित्र चिह्न बने हुए हैं, जो जैन कला और अध्यात्म में शुभता और सिद्धशिला (मुक्ति के लोक) के प्रतीक माने जाते हैं।

हस्तलिखित विवरण: नक्शे के ऊपरी हिस्से में बनी सारणी में जैन शास्त्रों के अनुसार नरक की विभिन्न भूमियों और उनके गोत्रों का बहुत ही सूक्ष्म और क्रमबद्ध विवरण लिखा गया है।

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विजय मेहरा बताते हैं कि लिपि की बनावट, प्रयुक्त कागज की बनावट (जो पुरानी हाथ से बनी स्थानीय कागजों जैसी दिख रही है), और मोड़ने के निशानों पर लगे सुदृढ़ीकरण पट्टियों को देखते हुए यह नक्शा 18वीं से 19वीं सदी (Late 18th to 19th Century) के बीच का प्रतीत होता है। इस कालखंड में जैन साधुओं और विद्वानों द्वारा जटिल ब्रह्मांड विज्ञान को समझाने के लिए ऐसे चित्र या 'पट' (Cloth/Paper Paintings) तैयार करने की समृद्ध परंपरा थी।



यह नक्शा मुख्य रूप से जैन धर्म के सात नरकों (Adho Loka) और उनकी परतों की भौगोलिक और आध्यात्मिक संरचना को समझाता है:
सात भूमियाँ (7 Hells): नक्शे के ऊपरी हिस्से में बनी तालिका में नरक की सात परतों के नाम और उनके गोत्र लिखे हैं:
1- रत्नप्रभा (घम्मा)
2- शर्कराप्रभा (वंसा)
3- बालुकाप्रभा (मेगा/मेघा)
4- पंकप्रभा (अंजणा)
5- धूमप्रभा (रिट्ठा)
6- तमःप्रभा (मघवा)
7- महातमःप्रभा (माघवी)
केंद्रीय वलय (Concentric Rings): नक्शे का मध्य भाग मध्यलोक (जहाँ मनुष्य और पशु रहते हैं) से होते हुए नीचे की ओर जाने वाले स्तरों को दिखाता है। इसमें विभिन्न द्वीप, समुद्र और नरक के जीवों (नारकियों) तथा भवनवासी व व्यंतर देवों के निवास स्थानों की सीमाएं खींची गई हैं।

पुरात्तवविद, कला इतिहासकार और जैन विद्या के विशेषज्ञ ऐसे नक्शों के बारे में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहते हैं:

वैज्ञानिक कलात्मकता: पुरात्तवविदों के अनुसार, प्राचीन और मध्यकालीन भारत में बिना आधुनिक उपकरणों के, केवल गणितीय और दार्शनिक सूत्रों के आधार पर ब्रह्मांड का ऐसा सटीक और सममित (Symmetrical) नक्शा बनाना भारत के उन्नत ज्यामितीय ज्ञान को दर्शाता है।

कर्म सिद्धांत का दृश्य रूप: विद्वानों का मानना है कि इन चित्रों का मुख्य उद्देश्य कला मात्र नहीं, बल्कि उपदेशात्मक था। भिक्षु और उपदेशक आम जनता को यह समझाने के लिए इन नक्शों का उपयोग करते थे कि बुरे कर्मों के फलस्वरूप जीव को अधोलोक (नरक) की इन भयानक परतों में भटकना पड़ता है।

सांस्कृतिक धरोहर: विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम (लंदन) और मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट (न्यूयॉर्क) जैसे वैश्विक संस्थानों में ऐसे जैन कॉस्मोलॉजिकल मानचित्रों को भारतीय चित्रकला और खगोल-विज्ञान का एक अनूठा और अमूल्य हिस्सा माना गया है।
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