उम्र के जिस पड़ाव पर लोग आराम को जिंदगी का हिस्सा बना लेते हैं, उसी उम्र में सीहोर के मोहन पाराशर आज भी लोहे का वजन उठाकर अपने हौसले की ताकत दिखा रहे हैं। 67 वर्षीय मास्टर्स वेटलिफ्टर मोहन पाराशर का चयन मलयेशिया में होने वाली अंतरराष्ट्रीय मास्टर्स वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिताओं के लिए हुआ है। वे 4 से 6 दिसंबर तक मलेशिया के पेनांग में आयोजित यूनाइटेड मास्टर्स वेटलिफ्टिंग फेडरेशन मास्टर्स वर्ल्ड कप और कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। वे 65 से 69 वर्ष आयु वर्ग की 85 किलोग्राम बॉडी वेट कैटेगरी में मुकाबला करेंगे।
तिरंगे के लिए फिर मैदान में उतरेंगे
मोहन पाराशर के लिए यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता नहीं, बल्कि पांच दशक से अधिक लंबे खेल सफर की अगली बड़ी चुनौती है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके पाराशर अब एक बार फिर तिरंगे के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। उनका लक्ष्य मलयेशिया में दमदार प्रदर्शन कर देश के लिए पदक जीतना है। उम्र बढ़ने के साथ उनका जुनून कम होने के बजाय और मजबूत हुआ है।
छह अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीत चुके हैं पाराशर
मोहन पाराशर अब तक विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में छह स्वर्ण पदक अपने नाम कर चुके हैं। इनमें दो कॉमनवेल्थ, एक वर्ल्ड कप, दो विश्व चैंपियनशिप और एक एशियन चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक शामिल है। इन उपलब्धियों ने उन्हें सीहोर ही नहीं, बल्कि भारतीय मास्टर्स वेटलिफ्टिंग में भी अलग पहचान दिलाई है।
सुबह चार बजे शुरू होती है तैयारी
मलयेशिया में होने वाली प्रतियोगिता के लिए पाराशर ने अभ्यास तेज कर दिया है। वे प्रतिदिन सुबह करीब 4 बजे उठते हैं और लगभग चार घंटे अभ्यास तथा फिटनेस पर ध्यान देते हैं। उनके लिए उम्र महज एक आंकड़ा है, जबकि अभ्यास, अनुशासन और फिटनेस उनकी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा हैं। लंबे अंतरराष्ट्रीय अनुभव के बावजूद वे अपनी तैयारी में किसी तरह की ढिलाई नहीं बरतना चाहते।
पांच दशक से ज्यादा पुराना है वेटलिफ्टिंग से रिश्ता
मोहन पाराशर बताते हैं कि वेटलिफ्टिंग से उनका रिश्ता करीब पांच दशक पुराना है। उन्होंने महज 13 वर्ष की उम्र में वजन उठाना शुरू किया था। उस दौर में खेल सुविधाएं और संसाधन आज की तरह उपलब्ध नहीं थे, लेकिन खेल के प्रति उनका जुनून उन्हें लगातार आगे बढ़ाता रहा। जिला स्तर से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे प्रदेश, राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा।
कम उम्र में ही बना ली थी पहचान
वेटलिफ्टिंग के शुरुआती दौर में ही पाराशर ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। वर्ष 1978 से 1982 तक वे लगातार पांच बार स्टेट चैंपियन रहे। लगातार मिली सफलताओं ने उनके भीतर आत्मविश्वास बढ़ाया। यही आत्मविश्वास आगे चलकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक ले गया। करीब पांच दशक बाद भी उनके अभ्यास का सिलसिला उसी समर्पण के साथ जारी है।
ग्रीस में 148 किलो वजन उठाकर जीता था स्वर्ण
मोहन पाराशर के खेल जीवन की यादगार उपलब्धियों में ग्रीस में आयोजित विश्व चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक भी शामिल है। वहां उन्होंने 148 किलोग्राम वजन उठाकर स्वर्ण पदक जीता था। यह उपलब्धि उनके लंबे अंतरराष्ट्रीय करियर के महत्वपूर्ण पड़ावों में गिनी जाती है। उनके लिए हर प्रतियोगिता देश का नाम ऊंचा करने का एक नया अवसर रही है।
खिलाड़ी के साथ गुरु की भूमिका भी निभा रहे
मोहन पाराशर बताते हैं कि वे केवल खुद पदक जीतने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नई पीढ़ी के वेटलिफ्टरों को तैयार करने में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनके कोचिंग सेंटर में 60 से अधिक वेटलिफ्टर प्रशिक्षण ले रहे हैं। उनकी कोचिंग में आधा दर्जन से अधिक खिलाड़ी नेशनल स्तर और खेलो इंडिया जैसी प्रतियोगिताओं में पदक हासिल कर चुके हैं।
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खिलाड़ियों को वजन के साथ हौसला उठाना भी सिखाते हैं
पाराशर अपने प्रशिक्षण में खिलाड़ियों को केवल वेटलिफ्टिंग की तकनीक ही नहीं सिखाते, बल्कि अनुशासन, नियमित अभ्यास, फिटनेस और मानसिक मजबूती पर भी जोर देते हैं। उनका मानना है कि खेल में सफलता केवल ताकत से नहीं मिलती, बल्कि लगातार अभ्यास और लक्ष्य के प्रति ईमानदार समर्पण से हासिल होती है।
युवाओं को खेलों से जुड़ने का संदेश
मोहन पाराशर युवाओं को भी खेलों से जुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका कहना है कि खेल केवल प्रतियोगिता या पदक जीतने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि स्वस्थ और अनुशासित जीवन का आधार भी हैं। युवाओं को नियमित रूप से किसी न किसी खेल से जुड़कर अपनी फिटनेस और स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए।
मलयेशिया में तिरंगे को सलाम कराने का लक्ष्य
67 वर्ष की उम्र में भी सुबह चार बजे उठकर अभ्यास करने वाले मोहन पाराशर की नजर अब मलयेशिया के पेनांग पर है। वहां वे भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहते हैं। उनके लिए यह केवल वजन उठाने की प्रतियोगिता नहीं, बल्कि उस तिरंगे के सम्मान से जुड़ा अवसर है, जिसके लिए उन्होंने अपनी जिंदगी के पांच दशक से अधिक समय खेल को समर्पित कर दिए हैं।