सतना की राजनीति के सादगी और संघर्ष का चेहरा रहे पूर्व विधायक शंकरलाल तिवारी अब हमारे बीच नहीं रहे। रविवार दोपहर दिल्ली के एम्स अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद उन्होंने अंतिम सांस ली। 72 वर्षीय तिवारी पिछले कई दिनों से अस्वस्थ थे और इलाज के दौरान उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी, जिसके बाद आज उनका देहांत हो गया। उनके निधन की खबर मिलते ही सतना में गहरा शोक छा गया। समर्थक, कार्यकर्ता और आमजन उनके घर और पार्टी कार्यालय पहुंचने लगे।
आपातकाल के योद्धा रहे तिवारी
8 अप्रैल 1953 को सतना जिले के चकदही गांव में जन्मे शंकरलाल तिवारी बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे। सिर्फ 22 वर्ष की उम्र में उन्होंने आपातकाल का विरोध किया और मीसाबंदी के रूप में 18 महीने रीवा, टीकमगढ़ और सतना की जेलों में बिताए। वह दौर उनके जीवन की दिशा तय करने वाला साबित हुआ। जेल से लौटे तो राजनीति को ही जनसेवा का माध्यम बना लिया।
तीन बार विधायक, हर बार जनता के भरोसे पर खरे उतरे
1998 में उन्होंने पहली बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा, और फिर 2003, 2008, 2013 में भाजपा के टिकट पर लगातार तीन बार सतना से विधायक चुने गए। अपने कार्यकाल में वे साधारण जीवन, मजबूत संगठनात्मक पकड़ और जनता से सीधे संवाद के लिए जाने जाते थे।
सीएम समेत नेताओं ने जताया शोक
पूर्व विधायक तिवारी के निधन पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं कई वरिष्ठ नेताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने कहा, “वरिष्ठ भाजपा नेता एवं सतना विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक श्री शंकरलाल तिवारी जी के निधन का समाचार अत्यंत दुःखद है। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोकाकुल परिजनों को यह दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें।”
राजनीति को सादगी और सेवा का पाठ पढ़ाने वाला नेता
शंकरलाल तिवारी अपने बेबाक स्वभाव और साफ छवि के लिए जाने जाते थे। उन्होंने राजनीति को कभी सत्ता का साधन नहीं, बल्कि जनसेवा का संकल्प माना। उनका जाना सतना की राजनीति के एक युग का अंत है। एक ऐसा युग, जो सादगी, ईमानदारी और विचारधारा से जुड़ा था।
हर वर्ग में निधन से गहरा दुख
पूर्व विधायक शंकरलाल तिवारी के निधन से जिले के हर वर्ग में गहरा दुख है। भाजपा के सक्रिय सदस्य अवनीश शुक्ला ने कहा कि यह बेहद दुखद पल है। हम सबने अपना मार्गदर्शक और नेता खो दिया है। ग्राम विकास और क्षेत्र के लिए वह सदैव तत्पर रहते थे। उनकी सादगी और सरलता लोगों को उनसे दीर्घकालिक समय के लिए जोड़कर रखती थी। उनका निधन सादगी और सेवा की राजनीति के एक युग के समाप्त हो जाने जैसा है।