पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार शक्ति के नौ रूप बताए गए हैं, जिनके 51 शक्तिपीठ भारत सहित नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में स्थापित हैं। लेकिन देवभूमि भारत वर्ष में अनेकानेक रहस्यमयी तथा गुप्त प्राचीन शक्ति पीठ हैं। ऐसे ही एक स्थल के दर्शन हम आपको करवा रहे हैं।
सागर जिले से खुरई राष्ट्रीय राजमार्ग के जरुआखेड़ा कस्बे से महज 10 किलोमीटर दूर जलंधर गांव में जंगलों के बीच विंध्याचल पर्वत माला की गोदी में विराजी है देवी की एक विलक्षण प्रतिमा, जिसे स्थानीय लोग ज्वाला माई कहते है। पुराणों में तथा दुर्गा सप्तमी में माता के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन है और इन्हीं के अनुसार प्राचीन काल से माता की विभिन्न स्वरूपों तथा लीलाओं पर आधारित प्रतिमाओं का निर्माण होता चला आ रहा है। जलंधर गांव में विराजमान देवी की यह प्रतिमा बड़ी ही विलक्षण है। प्रतिमा में माता पद्मासन में सात ज्वालाओं पर विराजी है, ज्वालाओं के अगल-बगल में दो शेर बने हुए है, माता की प्रतिमा की जिह्वा उनके उदर तक है।
एक ही पत्थर पर निर्मित प्रतिमा में अन्य देवियां भी बनी हुई हैं, जिन्हें क्रमश वैष्णवी ब्रह्माड़ी माहेश्वरी तथा भगवती है। माता का यह स्वरूप काली या चंडिका का स्वरूप माना जाता है। प्रतिमा के ऊपरी भाग में विभिन्न देवों की आकृतियां हैं। माता की प्रतिमा के शीश के ऊपर विश्राम मुद्रा में शिव अंकित हैं तथा इसके ऊपर अन्य देवता गण बने हुए हैं। चतुर्भुजी प्रतिमा के पीछे चक्र बना हुआ है। चार फीट की इस प्रतिमा में माता के चरणों के पास कलश रखा हुआ है।
इस प्रतिमा में वर्णित प्रसंग का उल्लेख रक्तबीज बध से है। कहानी के अनुसार, रक्तबीज नामक भयानक दैत्य के आतंक से सारी सृष्टि पीड़ित हो गई। रक्तबीज से देवता भी परास्त हो गए, क्योंकि रक्तबीज को बरदान था कि उसके रक्त की बूंद जहां गिरेगी, उससे एक नया दैत्य उत्पन्न होगा। तब देवताओं ने माता की स्तुति की और रक्तबीज संहार करने का निवेदन किया। इस कार्य के लिए तीनो देवताओं ने अपनी शक्तियों से देवियां उतपन्न की। ब्रहा से ब्राह्मणी, शिव से माहेश्वरी और विष्णु की शक्तियों से वैष्णवी प्रकट हुई, जिन्होंने माता पार्वती के साथ असुरों का संहार प्रारंभ कर दिया।
देवियों के इस युद्ध से रक्तबीज का बाल भी बांका नहीं हुआ। क्योंकि जब उसका कोई अंग कटता और रक्त की बूंद जमीन पर गिरती, तब नया दैत्य प्रकट हो जाता। ऐसी अवस्था में माता पार्वती ने अपने क्रोध स्वरूप को प्रकट किया, जिसे कहीं काली और कहीं चंडिका कहा गया है। माता के इस रूप ने रक्तबीज का रक्तपान कर उसकी एक बूंद भूमि पर नहीं गिरने दी और उसका संहार हुआ।
यहां पर इस प्रतिमा में माता के इसी कथानक के स्वरूप को दर्शाया गया है। मुख्य प्रतिमा में माता की जिह्वा उनके उदर तक होने तथा उदर में दूसरे मुख द्वारा उन्होंने रक्तबीज के रक्त का पान कर उसका संहार कर सृष्टि को उसके आतंक से मुक्त किया है। प्रतिमा में माता के उदर में एक मुख होने पर इन्हें उदर मुखी भी कहा जाता है तथा सात ज्वालाओं पर विराजित होने पर इन्हें ज्वाला मां के नाम से जाना जाता है। इस स्थल को तांत्रिक शक्तिपीठ भी माना जाता है। ज्वाला माई की इस विलक्षण प्रतिमा के साथ यहां माता गौरी की प्राचीन प्रतिमा तथा भगवान गणेश की अद्वितीय प्रतिमा विराजी है।
इन प्रतिमाओं के बारे में पुरात्तव तथा इतिहासविदों को कोई जानकारी नहीं है। लेकिन भारत की प्राचीन इतिहास के अध्ययन से यह माना जा सकता है कि यह प्रतिमा 9वीं-10वीं शताब्दी काल की हो सकती है। मंदिर में मिली गौरी प्रतिमा के स्वरूप अनुसार, इसे परमार कालीन मूर्ति शिल्प माना जा सकता है। इसके पीछे यह धारणा भी है कि समीपस्थ राहतगढ़ में परमार वंश का शासन रहने के शिलालेखीय प्रमाण मिलते हैं। वर्तमान में वर्ष की दोनों नवरात्रियों में प्राकृतिक वादियों में पहाड़ के ऊपर ही यहां मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
वर्तमान में ज्वाला माता का विशाल मंदिर निर्मित है और वर्तमान में इसका निर्माण एवं विस्तार क्रम चालू है। मंदिर में नवनिर्मित मंदिर के व्यवस्थापक ने बताया कि पहले माता की यह प्रतिमाएं घने जंगल में एक वृक्ष के नीचे विराजित थी, जिनकी स्थापना इस नवीन मंदिर में की गई है। यह प्राचीन और विलक्षण प्रतिमाएं यहां कहां से आई, यह रहस्य तथा खोज का विषय है। वैसे भी बुंदेलखंड अंचल में लगभग प्रत्येक गांव में बेशकीमती पुरा सम्पदाएं बिखरी पड़ी हैं, जिनके संरक्षण के कोई विशेष प्रयास नहीं किये गए हैं। अकेले सागर जिले की ही बात की जाए तो ऐसे अनेक प्राचीन ऐतिहासिक स्थल हैं, जिनका संरक्षण कर दिया जाए तो यहां पर्यटन केंद्र बन सकते हैं।
वैसे ज्वाला माता के यहां आगमन को लेकर ग्रामीण अंचलों में अनेक किवदंतियां भी प्रचलित हैं। लोग इस प्रतिमा का संबंध वर्तमान राहतगढ़ (प्राचीन नाम पथरीगढ़) जिसका वर्णन जगनिक के लिखे आल्हखंड में है। बताया जाता है, माता पथरीगढ़ के राजा ज्वाला सिंह की कुल देवी थी, जो उनसे रुष्ठ होकर यहां आ गई थी। वहीं, दूसरी कहानी अनुसार जब आसपास मुगलों ने आक्रमण किया, तब कुछ साधुओं ने इस प्रतिमा को जंगल में लाकर छुपा दिया था।
हालांकि, कहानी कुछ भी हो। लेकिन यह सत्य है कि माता की यह प्रतिमा पुराणों में वर्णित प्रसंग अनुसार दिव्य ओर आलौकिक है। इस स्वरूप की दूसरी प्रतिमा संभवतः भारतवर्ष में इकलौती है।माता के इस दिव्य तथा पुरातात्विक महत्व के वैभवशाली स्वरूप के दर्शन आपको आध्यात्मिक शक्ति तथा मानसिक शांति प्रदान करेंगे। इनके स्वरूप के प्रभाव को इनके दर्शनों के उपरांत ही जाना जा सकता है।