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रायसेन: दादा धूनी दरबार का अद्भुत अनुष्ठान, 51 दिन चला अनोखा यज्ञ, डेढ़ किलो सोना और 251 जड़ी-बूटियों की आहुति

Sat, 19 Sep 2026 11:43 AM IST
रायसेन ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायसेन

सार

उदयपुरा स्थित दादा धूनी दरबार में 51 दिनों तक चली यज्ञ धूनी में दावा किया गया कि 1 लाख 51 हजार किलो हवन सामग्री अर्पित की गई। इसमें फल-फूल, मिठाई, कपड़े, 251 प्रकार की जड़ी-बूटियों के साथ सोने-चांदी के आभूषण भी शामिल रहे।
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दादा धूनी दरबार में 51 दिनों तक चले महायज्ञ में आहुति देते संत शिवानंद महाराज - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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रायसेन के उदयपुरा स्थित दादा धूनी दरबार में 51 दिनों तक चले इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। आयोजन के दौरान यज्ञ धूनी में 1 लाख 51 हजार किलो फल-फूल, मिठाई, कपड़े, 251 प्रकार की जड़ी-बूटियां, डेढ़ किलो सोना और 4 किलो से अधिक चांदी के आभूषण अर्पित किए जाने का दावा किया गया है।

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संत शिवानंद महाराज के अनुसार करीब डेढ़ किलो सोना और 4 से 5 किलो चांदी के आभूषण भी धूनी में अर्पित किए गए। उनका कहना है कि वे किसी से चंदा या आर्थिक सहयोग नहीं लेते और यह आयोजन दादा धूनी वाले महाराज के आशीर्वाद से होता है।

आयोजन के दौरान प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने 24 घंटे प्रसादी ग्रहण की। संत शिवानंद महाराज का कहना है कि धूनी में अर्पित सोना और चांदी जलकर भस्म में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसे बाद में मां नर्मदा में विसर्जित किया जाता है। उन्होंने बताया कि यह आयोजन 29 जुलाई को गुरु पूर्णिमा से शुरू हुआ था और 17 सितंबर तक चला। इसके बाद 21 दिन का नर्मदा संकीर्तन 8 अक्टूबर तक जारी रहेगा।
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आयोजन के दौरान संत शिवानंद महाराज को इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स का प्रमाण पत्र दिए जाने की बात भी कही गई है। संत ने यह चुनौती भी दी कि यदि दुनिया में कोई व्यक्ति इसी तरह का आयोजन कराकर दिखाता है, तो वे उसे 21 करोड़ रुपये का नकद पुरस्कार देंगे।
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संत शिवानंद महाराज का कहना है कि वे बचपन से ही दादा धूनी वाले महाराज और मां नर्मदा की कृपा से इस तरह के धार्मिक आयोजन करते आ रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। उनका मानना है कि धूनी स्वयं मां नर्मदा का स्वरूप है, इसलिए उसमें कपड़े, सोना और चांदी शृंगार के रूप में अर्पित किए जाते हैं। हालांकि इन धार्मिक मान्यताओं और आयोजकों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है। इसे श्रद्धालुओं की आस्था और आयोजन से जुड़े दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

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