आंकड़ों से पता चलता है कि आलोच्य अवधि में एक लाख रुपये मूल्य वर्ग के कुल 318 चुनावी बॉन्ड की खरीद से 3.18 करोड़ रुपये, 10,000 रुपये मूल्य वर्ग के कुल 12 बॉन्ड की खरीद से 1.20 लाख रुपये और 1,000 रुपये मूल्य वर्ग वाले कुल 24 बॉन्ड की खरीद से 24,000 रुपये का चुनावी चंदा दिया।
हालांकि, आरटीआई से यह खुलासा भी हुआ है कि संबद्ध सियासी दलों ने आलोच्य अवधि के दौरान खरीदे गए 1,407.09 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड में से 1,395.89 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड को ही भुनाया गया। यानी 11.20 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड बिना भुनाए रह गए जिनमें एक करोड़ रुपये मूल्य वर्ग वाले 11 बॉन्ड, दस लाख रुपये मूल्य वर्ग के दो बॉन्ड और 1,000 रुपये मूल्य वर्ग के 15 बॉन्ड शामिल हैं।
आरटीआई के आंकड़ों से एक और अहम बात सामने आती है कि सातों चरणों में ऐसा एक भी चरण नहीं है, जिसमें दस लाख रुपये और एक करोड़ रुपये के मूल्य वर्गों वाले चुनावी बॉन्ड नहीं बिके हों। यानी सियासी दलों को चंदा देने वालों का रुझान सबसे महंगे मूल्य वर्ग के दोनों बॉन्ड की ओर हर बार बना रहा।
गौड़ ने अपनी अर्जी में यह भी पूछा था कि आलोच्य अवधि में किन-किन सियासी दलों ने कुल कितनी धनराशि के चुनावी बॉन्ड भुनाए? हालांकि, एसबीआई ने इस प्रश्न पर आरटीआई अधिनियम के सम्बद्ध प्रावधानों के तहत छूट का हवाला देते हुए इसका खुलासा करने से इनकार कर दिया।
सियासी सुधारों के लिए काम करने वाले स्वैच्छिक समूह एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने चुनावी बॉन्ड की बिक्री पर रोक की गुहार लगाते हुए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले में अदालत ने चुनावी बॉन्ड के जरिये राजनीतिक फंडिंग पर रोक लगाने से शुक्रवार को हालांकि इनकार कर दिया। लेकिन उसने इस प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिये कई शर्तें लगा दीं।
प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने अपने अंतरिम आदेश में सभी राजनीतिक पार्टियों को निर्देश दिया कि वे चुनावी बॉन्ड के जरिये प्राप्त चंदे की रसीदें और चंदा देने वालों की पहचान का ब्योरा सीलबंद लिफाफे में चुनाव आयोग को 30 मई तक सौंपें।