वाहनों और रैलियों से उठी धूल जमीन पर लौट गई है। हेलिकॉप्टर नेताओं के अपने ठिकानों पर ठहर गए हैं।
जब विश्लेषकों को चुनाव का कोई ऐसा मुद्दा नजर नहीं आ रहा है है, जिसे इंजन बनाकर कोई एक पार्टी जीत हासिल कर सके, तब जातियों का गणित मिलाया जा रहा है।
करीब एक करोड़ उन नए-नौजवान मतदाताओं की दुहाई दी जा रही है, जो विकास के पोस्टर-बॉय की खोज में है। मतदाता अपनी राय को अघोषित पूंजी की तरह छुपाकर बैठा है, जिसका खुलासा कुछ दिनों में होने वाला है।
दोनों दलों के नेता बड़े दावे से कह रहे हैं कि जीत उनकी ही होने वाली है। सोमवार की सुबह से मतदाता जब अपनी राय जाहिर करेगा, तब वास्तव में वह स्थानीय उम्मीदवार पर अपनी पसंद-नापसंद पर ठप्पा लगा रहा होगा या अचानक नवधनाढ्य नेताओं के खिलाफ गुस्से का इजहार कर रहा होगा।
मोदी, शिवराज, राहुल पर जनमत सर्वे
पूरे अभियान के चार सुपर सितारे थे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और शिवराज सिंह चौहान।
नरेंद्र मोदी ने साढ़े तीन दिनों में राज्य में 14 सभाएं कर डालीं। वह भी दांव पर लगे हैं। नेता भले ही नहीं मानें यह चुनाव मोदी के अलावा राहुल और शिवराज सिंह पर भी जनमत सर्वेक्षण है।
राहुल गांधी का फार्मूला टिकट बंटवारे में तो नहीं चला लेकिन क्या उनका करिश्मा चुनाव अभियान में चल पाया? इस प्रश्न का उत्तर मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजों से निकलेगा।
शिवराज सिंह चौहान ने 51 में 38 जिलों को घूम डाला है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने करीब 24 जिलों में सभाएं कीं।
मुद्दे क्या हैं?
कांग्रेस का कहना है कि भाजपा की सरकार भ्रष्ट है, उसने कोई विकास नहीं किया और भ्रष्टाचार चरम पर है, उसके खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी है।
भाजपा कहेगी, केंद्र के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी है, केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार के खुलासे हुए हैं और पिछले तीन साल से केंद्र सरकार पॉलिसी पैरालिसिस का शिकार है और पूरी अर्थव्यवस्था को ठप कर दिया है। महंगाई बढ़ा दी है।
विदेश नीति विफल है। नेशनल हाईवे खराब हैं। वे यह भी कहेंगे कि दिग्विजय सरकार ने जो काम किया था, उसके मुकाबले शिवराज का रिकार्ड शानदार है।
यह चुनाव पार्टियों के उम्मीदवारों पर है। जनता जहां भी पूर्व विधायकों से बहुत ज्यादा खफा हैं, और पार्टी ने नाराजगी का लिहाज किए बिना टिकट दिया है तो मतदाता उसे घर भेजने का संकल्प ले रहे हैं।
इस चुनाव में सिर्फ अच्छा या सबसे कम बुरा उम्मीदवार जीतने वाला है। भितरघात दोनों पार्टियों में है। अचानक धनी बने और उपेक्षा करने वाले विधायकों के प्रति लोगों में खासा गुस्सा है।
आधे उम्मीदवार करोड़पति
जो 141 विधायक एक बार फिर चुनाव मैदान में हैं, उनकी संपत्ति में 242 फीसदी का इजाफा हुआ है। क्या लोगों के लिए नाराज होने का यह पर्याप्त कारण नहीं है?
एमपी इलेक्शन वाच का कहना है कि कांग्रेस, भाजपा और बसपा के इन 141 विधायकों की दौलत 1.70 करोड़ के आसपास थी। अब वह 5.81 करोड़ रुपए हो गई है।
चुनाव लड़ रहे 683 उम्मीदवारों में से 350 करोड़पति हैं। यह करीब 51 फीसदी हैं। 2008 में यह संख्या केवल 29 फीसदी थी।
चुनावी संभावनाएं
ग्वालियर-चंबल, रीवा-सीधी-सतना और मालवा के तीन क्षेत्र सरकार बनाने-बिगाड़ने में अहम भूमिका अदा करेंगे। ग्वालियर-चंबल और रीवा-सीधी-सतना में कांग्रेस को बहुत उम्मीदें हैं।
यदि कांग्रेस वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती है तो सरकार बनाना उसके बूते का नहीं। भाजपा भी यदि इन इलाकों में अपनी सीटें बरकरार नहीं रख पाती है तो उसके लिए भी सरकार बनाना संभव नहीं होगा।
दोनों पार्टियों की सीटों में 2008 की तरह बहुत ज्यादा अंतर नहीं होगा। बसपा के उम्मीदवार 7-10 सीटें हासिल कर सकते हैं।
विकास का मिथक
शिवराज सरकार के विकास के दावे मानव संसाधन विकास के आंकड़ों में उतने पुख्ता नजर नहीं आते। राज्य में 10 फीसदी विकास दर और 18 फीसदी तक की कृषि विकास दर के बाद भी कई आंकड़े डरावने हैं।
राज्य में रोजाना 6 हत्याएं होती हैं, 60 चोरियां, पांच लूट, 23 मौतें सड़क दुर्घटनाओं में होती है। महिलाओं पर अत्याचारों के मामले में तो बलात्कार की संख्या हर साल बढ़ती गई है।
2008 से 2012 के बीच 15,901 बलात्कार हुए हैं। स्वास्थ्य के मानकों में आज भी मध्य प्रदेश में कुपोषण, शिशुओं की मृत्यु और माताओं की मृत्यु के आंकड़ें डरावने हैं।
कांग्रेस का कुप्रबंधन
शिवराज सरकार के खिलाफ दस वर्ष की एंटी-इनकंबेंसी का लाभ उठाने के लिए कांग्रेस को जिस तरह से टिकट बांटने चाहिए थे, वे नहीं बांटे गए। बागियों की संख्या बहुत ज्यादा रही।
अंदरूनी संघर्ष के कारण कई सीटें हाथ से जाती रही हैं। केंद्र सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी को भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ अहम मसला बनाया है।
केंद्र सरकार की आर्थिक मोर्चे पर विफलताओं, महंगाई और घोटालों व मंत्रियों के जेल जाने के मुद्दे कांग्रेस के विरुद्ध रहे हैं।
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बनाम जाति
मध्य प्रदेश के इस चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का कोई कार्ड और मुद्दे नहीं उछाले गए हैं। धार जैसी संवेदनशील जगह भी शायद चुनाव आयोग की सख्ती का असर दिखाई दिया।
भाजपा ने भोपाल उत्तर से आरिफ बेग को टिकट देकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की सारी संभावनाओं को खत्म कर दिया। उसका स्थान जातीय ध्रुवीकरण ने ले लिया है।
राज्य में अनेक समीकरण जातियों के हिसाब से बने हैं और ये चुनाव के नतीजों पर बड़ा असर डालेंगे।