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खुलासा: पचमढ़ी झील के पानी में मिलीं खतरनाक धातुएं, कैंसर का खतरा बढ़ा; वैज्ञानिकों ने बताए दुष्प्रभाव

Tue, 13 Oct 2026 10:08 PM IST
दिनेश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर

सार

डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के शोध में पचमढ़ी झील के पानी में कैडमियम सहित भारी धातुओं की मौजूदगी सामने आई है। अध्ययन में स्वास्थ्य और जलीय पर्यावरण पर संभावित दुष्प्रभावों की आशंका जताई गई। वैज्ञानिकों ने नियमित जल जांच, स्वास्थ्य शिविर और प्रमाणित जल शुद्धिकरण प्रणालियों के उपयोग की सलाह दी है।
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पचमढ़ी के जल स्रोतों में खतरनाक भारी धातुओं की मौजूदगी का खुलासा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के जूलॉजी विभाग के वैज्ञानिकों ने सागर और पचमढ़ी के जल स्रोतों में खतरनाक भारी धातुओं की मौजूदगी का खुलासा किया है। पचमढ़ी झील में कैडमियम धातु का स्तर तय सुरक्षा मानकों से बहुत अधिक मिला है। इस विषैले जल का निरंतर सेवन करने से गुर्दे की खराबी, हड्डियों की कमजोरी और कैंसर जैसी घातक बीमारियों का जोखिम उत्पन्न होता है। झील और नदियों के जल में मौजूद अन्य धातुएं यद्यपि मानक सीमा के भीतर हैं, परंतु इनके लगातार संपर्क से मानव की तंत्रिका प्रणाली, हृदय और पर्यावरण पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं। स्थिति की चिंताजनक प्रकृति को देखते हुए शोध दल ने मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा राज्य सरकार से प्रभावित क्षेत्रों में नियमित जल जांच कराने, स्वास्थ्य परीक्षण शिविर आयोजित करने और जन जागरूकता अभियान चलाने की सिफारिश की है।
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झील में भारी धातुओं का जमाव
शोध दल के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. राजकुमार कोईरी और उनके सहयोगियों ने ICP-MS तकनीक का प्रयोग करके जल के नमूनों की जांच की। इस अध्ययन में पानी के भीतर स्ट्रॉन्शियम, कैडमियम, मैंगनीज, कॉपर, निकेल और बेरियम जैसी छह प्रमुख भारी धातुएं पाई गईं। जांच के दौरान पचमढ़ी झील के जल में स्ट्रॉन्शियम की मात्रा 27.54 पीपीबी तथा कैडमियम का स्तर 0.69 पीपीबी दर्ज हुआ, जो राष्ट्रीय तथा पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों से काफी अधिक है। शोध टीम में सिद्धार्थ राजपूत, सतीश सत्य बरिक, श्रुति जैन, कुलदीप गौलिया, डॉ. अदिति मेहरोत्रा, डॉ. विवेक कुमार पांडे, डॉ. संदीप कुमार और डॉ. चंद्रमा प्रकाश उपाध्याय शामिल हैं। यह अध्ययन भारत सरकार के बायोटेक्नोलॉजी विभाग की DBT BUILDER परियोजना, DST-SERB तथा ANRF-ARG के आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग से संपन्न हुआ। इस संपूर्ण अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय शोध स्रोत 'बुलेटिन ऑफ एनवायरनमेंटल कंटैमिनेशन एंड टॉक्सिकोलॉजी' ने प्रकाशित किया है।
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जलीय तंत्र और सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव
जल में घुले विषैले रसायनों का वनस्पतियों पर प्रभाव जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने मनी प्लांट को बायोइंडिकेटर के रूप में प्रयोग किया। वैज्ञानिकों ने 21 दिन तक जल के नमूनों में पौधे उगाकर फ्लोरपेन विश्लेषक से उनकी प्रकाश संश्लेषण प्रणाली का अध्ययन किया। परीक्षण में पाया गया कि जलीय रसायनों के दबाव से पौधों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया में शारीरिक तनाव पैदा हो रहा है। मैंगनीज और कॉपर जैसी धातुएं जलीय वनस्पति की स्वाभाविक वृद्धि रोक देती हैं। यह जहर खाद्य श्रृंखला के जरिये मछलियों से होता हुआ इन्सानों तक पहुंच सकता है। कैडमियम एक नरम और नीले-सफेद रंग की भारी धातु है, जो प्राकृतिक रूप से मिट्टी, पानी और चट्टानों में उपस्थित रहती है। इसका इस्तेमाल बैटरियों, प्लास्टिक, इलेक्ट्रोप्लाटिंग, सौर पैनल और मिश्रधातु बनाने में किया जाता है। पर्यावरण में यह धातु ज्वालामुखी विस्फोट, जंगल की आग, फॉस्फेट उर्वरक, औद्योगिक कचरे और ई-वेस्ट के गलत निपटान से फैलती है। सिगरेट का धुआं भी इसका प्रमुख स्रोत है।
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आम नागरिकों के लिए जरूरी सावधानियां
वैज्ञानिकों ने स्थानीय नागरिकों को नदी या झील के कच्चे पानी का सीधे सेवन न करने की सलाह दी है। पानी को केवल उबालना भारी धातुओं को नष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं होता। पानी साफ करने के लिए केवल प्रमाणित फिल्टर, आरओ अथवा आयन एक्सचेंज प्रणाली का प्रयोग करना चाहिए। जब तक जांच में जलाशयों का पानी पूर्णतः सुरक्षित घोषित न हो जाए, तब तक वहां की मछलियों के खान-पान से परहेज करें। गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को प्राथमिकता के आधार पर अपनी चिकित्सीय जांच करानी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को लगातार पेटदर्द, शारीरिक कमजोरी, हड्डियों में दर्द अथवा तंत्रिका तंत्र से जुड़ी परेशानियां महसूस हों, तो उन्हें तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। शोधकर्ताओं ने सरकार और आम जनता से आग्रह किया है कि सभी मिलकर सुरक्षित जल अभियान के लिए ठोस कदम उठाएं।
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