पितृ मोक्ष अमावस्या पर ओंकारेश्वर में 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने मां नर्मदा में स्नान कर पितरों के निमित्त तर्पण और पूजन किया। घाटों पर रातभर धार्मिक अनुष्ठान, भजन-कीर्तन और निमाड़ी गम्मत के साथ लोक परंपराओं का संगम दिखा।
पितृ मोक्ष अमावस्या पर तीर्थनगरी ओंकारेश्वर में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। पितरों की शांति और मोक्ष की कामना लेकर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां नर्मदा के विभिन्न घाटों पर पहुंचे। सुबह करीब चार बजे से ही घाटों पर श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। दिन चढ़ने के साथ भीड़ बढ़ती गई। अनुमान के मुताबिक, 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने मां नर्मदा में आस्था की डुबकी लगाई और पितरों के निमित्त तर्पण, पूजन व धार्मिक अनुष्ठान किए।
पितृ मोक्ष अमावस्या के अवसर पर ओंकारेश्वर के नर्मदा घाटों पर देर रात तक धार्मिक गतिविधियां चलती रहीं। श्रद्धालुओं ने अपने पितरों की आत्मशांति के लिए विधि-विधान से तर्पण किया। कई लोगों ने ब्राह्मणों के माध्यम से पूजन-अनुष्ठान कराए, जबकि कई परिवार सामूहिक रूप से पितृ कर्म करते नजर आए। घाटों पर कहीं मंत्रोच्चार गूंज रहा था, तो कहीं भजन-कीर्तन से वातावरण भक्तिमय बना हुआ था।
इस दौरान निमाड़ और मालवा की लोक संस्कृति की झलक भी दिखाई दी। भजन-कीर्तन के साथ निमाड़ी गम्मत ने श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया। धार्मिक आस्था और लोक परंपराओं के इस संगम ने ओंकारेश्वर के घाटों को अलग ही रंग में रंग दिया। रातभर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही।
खरगोन जिले के लक्ष्मण महाराज ने बताया कि बड़वा-भोपाओं से जुड़ी यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। श्रद्धालु अपनी मान्यताओं के अनुसार यहां पहुंचकर धार्मिक क्रियाएं करवाते हैं।
देवा महाराज ने इसे बाधा निवारण से जुड़ी मान्यता बताया। उनके अनुसार, कई लोग परिवार में लंबे समय से चली आ रही परेशानियों और बाधाओं से मुक्ति की कामना लेकर यहां आते हैं। वहीं, श्रवण महाराज के अनुसार, श्रद्धालु मनोकामना पूर्ति की आस लेकर इन धार्मिक परंपराओं का हिस्सा बनते हैं।
आस्था के साथ जीवंत दिखी निमाड़ की लोक संस्कृति
पितृ मोक्ष अमावस्या पर ओंकारेश्वर के घाटों पर धार्मिक आस्था के साथ निमाड़ की लोक संस्कृति भी जीवंत दिखाई दी। नर्मदा स्नान, तर्पण और पूजन के बीच भजन-कीर्तन और निमाड़ी गम्मत ने माहौल को अलग रंग दिया। दूर-दराज से आए श्रद्धालु देर रात तक घाटों पर मौजूद रहे।
इस अवसर पर एक ओर श्रद्धालु अपने पितरों की शांति और मोक्ष की कामना लेकर मां नर्मदा की शरण में पहुंचे, तो दूसरी ओर सदियों से चली आ रही स्थानीय धार्मिक और लोक परंपराओं की झलक भी देखने को मिली। नर्मदा के घाटों पर रातभर श्रद्धा, भक्ति, धार्मिक अनुष्ठान और लोक संस्कृति का अनूठा संगम नजर आया।