मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण के मुद्दे पर अदालती कार्रवाई के साथ-साथ राजनीतिक और सामाजिक हलचल तेज हो गई है। हाई कोर्ट के उस आदेश के बाद प्रदेश में सियासी बयानबाजी तेज हुई है, जिसमें अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य में फिलहाल ऐसी कोई स्थिति नहीं है जिससे अन्य पिछड़ा वर्ग को तुरंत 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए और केवल 14 प्रतिशत आरक्षण ही मान्य रहेगा। इस फैसले के बाद सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं।
वहीं, पिछड़ा वर्ग से जुड़े विभिन्न सामाजिक संगठनों ने प्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों पर अपने अधिकारों की आवाज उठाने के लिए व्यापक आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए जबलपुर के भेड़ाघाट में दो दिवसीय पिछड़ा वर्ग संगम का आयोजन किया गया है, जिसमें राज्यभर के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं।
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भेड़ाघाट संगम में बनी व्यापक रणनीति
भेड़ाघाट में इस दो दिवसीय संगम के दौरान प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए अन्य पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधियों ने न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका में वर्ग के समुचित प्रतिनिधित्व पर गहन मंथन किया। सम्मेलन में मौजूद वक्ताओं ने निर्णय लिया कि प्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों में आरक्षण और अधिकारों के सवाल को प्राथमिकता से उठाया जाएगा। प्रतिनिधियों ने हाई कोर्ट के फैसले के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। बैठक में शामिल नेताओं और समाजसेवियों ने इस बात पर जोर दिया कि आरक्षण के अधिकार को प्राप्त करने के लिए प्रदेश स्तर पर एक प्रभावी सामाजिक और राजनीतिक लामबंदी आवश्यक है, जिसे राज्य के प्रत्येक क्षेत्र तक पहुंचाया जाएगा।
कमलनाथ सरकार के निर्णय से उपजा विवाद
अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण से जुड़ा यह विवाद वर्ष 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के एक बड़े निर्णय के साथ आरंभ हुआ था। कमलनाथ सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का अध्यादेश जारी किया था। इसके तत्काल बाद इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई, जिसके चलते यह मामला पिछले आठ वर्षों से मध्य प्रदेश हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कानूनी बहस का केंद्र बना हुआ है। प्रदेश की कुल जनसंख्या में अन्य पिछड़ा वर्ग की बड़ी हिस्सेदारी को देखते हुए दोनों प्रमुख राजनीतिक दल इस मुद्दे को अत्यंत संवेदनशील मान रहे हैं। कांग्रेस को आशा थी कि इस कदम से उसे बड़ा राजनीतिक लाभ मिलेगा, परंतु कानूनी जटिलताओं के कारण मामला उलझता चला गया।
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राजनीतिक खींचतान
आरक्षण को लेकर जारी खींचतान के बीच कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने राज्य सरकार की पैरवी पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार अदालत में अन्य पिछड़ा वर्ग के पक्ष में आवश्यक सामाजिक व प्रशासनिक आंकड़े मजबूती के साथ प्रस्तुत नहीं कर पाई। यदि सरकार पर्याप्त तथ्य और आंकड़े समय पर रखती तो न्यायिक स्थिति भिन्न हो सकती थी। उन्होंने राजनीतिक दल के सीधे पक्षकार बनने की वैधानिक स्थिति को भी अस्पष्ट बताया।
कैबिनेट मंत्री ने कहा- विवाद की जड़ कांग्रेस सरकार
दूसरी ओर, प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इस समूचे विवाद की जड़ कांग्रेस सरकार का अपरिपक्व और जल्दबाजी में लाया गया अध्यादेश था, जिसका कोई मजबूत कानूनी आधार नहीं था। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग को उसका अधिकार दिलाने के प्रति प्रतिबद्ध है और हाई कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है। वहीं, इस मामले में सामान्य वर्ग के छात्रों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता आदित्य सांघी ने सुप्रीम कोर्ट में एक कैविएट याचिका दायर की है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शीर्ष अदालत द्वारा दूसरे पक्ष की बात सुने बिना कोई भी एकतरफा अंतरिम या अंतिम आदेश जारी न किया जाए।