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सत्ता का रौब या अफसरशाही की ठसक: नेता-अफसर टकराव पर केंद्र का दखल क्यों?, कहां से कहां तक पहुंचे ये विवाद

सार

मध्यप्रदेश में नेताओं और अफसरों के बीच बढ़ते टकराव ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। भाजपा विधायकों और अधिकारियों के विवादों के बाद केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए राज्यों को जनप्रतिनिधियों के सम्मान और तय प्रोटोकॉल के सख्त पालन के निर्देश जारी किए हैं। पढे़ं पूरी खबर

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नेताओं और अफसरों के बीच वाद-विवाद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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लोकतंत्र के चार स्तंभों में विधायिका और कार्यपालिका बहुत महत्वपूर्ण हैं। इनके तालमेल से ही विकास परख जनतंत्र चलता है। जनता के काम होते हैं, पर इसमें तालमेल की कमी मध्य प्रदेश में देखी जा रही है। अफसरशाही हावी हो रही है तो नेताओं के कहने-बोलने का असर कम होता दिख रहा है। इससे नेता परेशान हैं और विवाद जब-तब सामने आ रहे हैं। बढ़ते विवादों के बीच केन्द्र सरकार ने दखल दिया है। अब साफतौर पर अफसरों को कड़े शब्दों में कहा गया है कि जनप्रतिनिधियों के लिए तय प्रोटोकॉल का पालन किया जाए। आखिर मध्य प्रदेश में ऐसा हो क्यों रहा है? इसके कारण क्या हैं? ताजा विवादों का आखिर में हल क्या निकला? ये सब जानते हैं, इस खबर में

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मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को बने ढाई साल का वक्त गुजर चुका है। विकास के काम भी हो रहे हैं। इस दौरान कई बार अफसर और नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक, टकराव की खबरें भी सामने आ रही हैं। हाल ही में भाजपा विधायक प्रीतम सिंह लोधी और आईपीएस अधिकारी विवाद, लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह और आईएएस अधिकारी अरविंद शाह प्रकरण सहित कई घटनाओं ने राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में बहस छेड़ दी है। इसी बीच केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने सांसदों-विधायकों के साथ व्यवहार और प्रोटोकॉल पालन को लेकर राज्यों को दोबारा निर्देश जारी कर दिए। अब इनका पालन करना और ज्यादा अनिवार्य कर दिया गया है। 

केन्द्र ने राज्य को क्या कहा?
  • प्रशासनिक अधिकारियों को उनके कर्तव्यों, जिम्मेदारियों और जनप्रतिनिधियों के प्रति व्यवहार संबंधी नियमों को लेकर संवेदनशील बनाया जाए। 
  • सांसदों एवं राज्य विधानमंडल के सदस्यों से जुड़े मामलों में संवाद, जवाब और कार्रवाई समयबद्ध एवं सम्मानजनक तरीके से हो। 
  • केन्द्र के दिशा-निर्देशों को राज्य, संभाग और जिला स्तर तक सभी अधिकारियों तक पहुंचाया जाए, ताकि जमीनी स्तर पर भी इनका प्रभावी पालन सुनिश्चित हो सके। 
  • निर्देशों के अनुपालन की  केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को उपलब्ध कराई जाए। 
  • आदेश का उद्देश्य प्रशासन एवं जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर समन्वय और संवाद बनाए रखना है। 
  • प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच आधिकारिक कार्यों में निर्धारित प्रक्रिया और शिष्टाचार का सख्ती से पालन  हो
  • सांसदों और विधायकों के साथ संवाद एवं कार्यवाही के दौरान तय प्रोटोकॉल का पालन हर स्तर पर अनिवार्य रूप से  हो 
  • अधिकारियों के बीच टकराव जैसी स्थिति ना बने। ऐसे घटनाक्रम शासन-प्रशासन के लिए असहज माहौल पैदा करते हैं।

ऐसी नौबत मध्यप्रदेश में क्यों आई?
ये आदेश मध्य प्रदेश में भेजने के पीछे कई घटनाएं हैं। इन घटनाओं को सिलसिलेवार पढ़िए। इसके साथ ही इनका हल क्या निकला, वो भी जानिए

जब सांसद का ननि आयुक्त ने नहीं उठाया फोन 
करीब एक साल पहले भोपाल जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति (DISHA) की  पहली बैठक में  जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच समन्वय और संवाद की कमी देखी गई। ये बैठक भोपाल सांसद आलोक शर्मा की अध्यक्षता में हुई थी। बैठक में नगर निगम की समीक्षा शुरू होने पर तत्कालीन निगम आयुक्त हरेंद्र नारायण यादव नहीं आए। फिर सांसद ने आयुक्त को फोन लगाया, पर उन्होंने फोन नहीं उठाया। इसके बाद विवाद बढ़ा। 

हल क्या निकला:  ये बात ऊपर तक पहुंची। बाद में आयुक्त नगर निगम को कलेक्टर बनाकर छिंदवाड़ा भेज दिया गया। 

जब विधायक ने सुनाई खरी-खोटी
शिवपुरी की पिछोर सीट से भाजपा विधायक प्रीतम सिंह लोधी और आईपीएस अधिकारी के बीच विधायक के बेटे दिनेश लोधी को लेकर विवाद बढ़ा। विधायक के बेटे की थार से दुर्घटना हुई थी। इस पर पुलिस ने कार्रवाई की। इसके बाद विधायक ने पुलिस अफसर को लेकर टिप्पणियां की थीं। विधायक ने वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर वायरल किया। इस मामले में आईपीएस एसोसिएशन पुलिस अधिकारी के समर्थन में आगे आई। एसोसिएशन ने बयान की निंदा करते हुए कार्रवाई की मांग की। 

हल क्या निकला:  सीएम मोहन यादव और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने विधायक प्रीतम लोधी को तलब किया। इसके बाद विधायक लोधी ने माफी मांगी। उनके सुर बदले और विवाद शांत हुआ। 

मंत्री और सीईओ का विवाद भी सुर्खियों में
जबलपुर में लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह और स्मार्ट सिटी सीईओ अरविंद शाह के बीच कथित विवाद भी सुर्खियों में रहा। बताया गया कि यह विवाद एक महिला कर्मचारी की उपस्थिति को लेकर हुआ। अफसर ने महिला कर्मचारी को कार्यालय में उपस्थित रहने के लिए कहा। फिर महिला कर्मचारी ने इसकी शिकायत मंत्री से की। आईएएस एसोसिएशन के अनुसार अधिकारी ने मंत्री पर अभद्र व्यवहार और धमकाने के आरोप लगाए। बाद में एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री को पूरे मामले से अवगत कराया। 

हल क्या निकला: कथित तौर पर इस मामले में सीएम मोहन यादव की मध्यस्थता में अफसर और मंत्री के बीच गलतफहमी को दूर की गई। 

आलीराजपुर में महिला सीईओ को धमकी
आलीराजपुर में जनपद पंचायत सीईओ प्रिया काग को कैबिनेट मंत्री नागरसिंह चौहान के भाई इंदर सिंह चौहान ने धमकाया। इस घटना का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया। पूरा मामला कन्या विवाह योजना के आवेदन निरस्त होने को लेकर था। बताया जाता है कि मंत्री के भाई ने महिला अधिकारी से अभद्रता की और धमकी दी। 

हल क्या निकला:  मंत्री नागरसिंह चौहान ने मामले से खुद को अलग कर लिया। कैबिनेट मंत्री नागरसिंह चौहान के भाई इंदर सिंह चौहान के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। 


 

भिंड में विधायक-कलेक्टर आमने-सामने
भिंड में खाद संकट को लेकर भाजपा विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह किसानों के साथ कलेक्टर बंगले के बाहर धरने पर बैठे। इस दौरान कलेक्टर संजीव श्रीवास्तव और विधायक के बीच तीखी बहस हुई। विवाद के दौरान विधायक द्वारा कलेक्टर की ओर हाथ उठाने और अभद्र भाषा के उपयोग का वीडियो भी सामने आया। सुरक्षाकर्मियों ने बीच-बचाव किया। इस मामले में विधायक किसानों का खाद नहीं मिलने की बात कहते रहे। वहीं, दूसरी तरफ प्रशासन की तरफ से रेत के अवैध कारोबार पर कार्रवाई को रोकने का दबाव बनाना विवाद का कारण बताया गया। 

हल क्या निकला: इस मामले में विधायक को संगठन स्तर पर समझाइश दी गई और बाद में कलेक्टर का ट्रांसफर कर भोपाल बुला लिया गया। 

IAS और IPS एसोसिएशन की सक्रियता बढ़ी
इन विवादों के बीच अगर किसी की पूछ परख बढ़ी है तो IAS और IPS एसोसिएशन की। अफसरों के अधिकारों को लेकर इन एसोसिएशन का गठन किया गया था। हाल के दिनों में जब भी विवाद बढ़ें हैं तो इन्हीं एसोसिएशन के माध्यम से विधायिका पर दबाव बनाया गया है। फिर समस्या का हल निकला है। अधिकारियों का कहना है कि सार्वजनिक अपमान और दबाव की घटनाएं प्रशासनिक स्वतंत्रता को प्रभावित करती हैं। आईएएस ऑफिसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मनु श्रीवास्तव ने कहा कि समाज में सहनशीलता लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों का भी ध्यान रखा जाता है, लेकिन इस बात का ध्यान दोनों पक्षों को रखना चाहिए। उन्होंने माना कि कार्य का दबाव पहले की तुलना में बढ़ा है, जिसके कारण कई बार आपसी मतभेद और मनमुटाव जैसी स्थितियां सामने आ जाती हैं।

जनता की अपेक्षाएं पहले की तुलना में काफी बढ़ीं
वरिष्ठ पत्रकार प्रभु पटैरिया का कहना है कि जनप्रतिनिधियों से आम जनता की अपेक्षाएं पहले की तुलना में काफी बढ़ गई हैं। वहीं दूसरी ओर कई जनप्रतिनिधियों में अपने पद को लेकर अहम की भावना भी दिखाई देने लगी है। इसी तरह अधिकारियों के स्तर पर भी स्थिति बदली है। इसके बावजूद लगातार सामने आ रहे विवाद इस बात का संकेत हैं कि दोनों पक्षों के बीच अहम का टकराव बढ़ रहा है। प्रभु पटैरिया के अनुसार विधायक जनता की समस्याओं और क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर अधिकारियों के सामने रखते और बहस करते हैं, लेकिन कई बार अधिकारी उसे व्यक्तिगत हस्तक्षेप के रूप में लेने लगते हैं। उन्होंने कहा कि विधानसभा में भी कई बार जनप्रतिनिधियों ने प्रोटोकॉल का पालन नहीं होने और उपेक्षा का मुद्दा उठाया है। वहीं कलेक्टर-कमिश्नर कॉन्फ्रेंस में भी मुख्यमंत्री की ओर से लगातार निर्देश दिए जाते रहे हैं कि जनप्रतिनिधियों का सम्मान सुनिश्चित किया जाए।

क्या सोशल मीडिया ने बढ़ाए विवाद?
सोशल मीडिया और वायरल वीडियो की राजनीति ने नेता-अफसर विवादों को सार्वजनिक बना दिया है। पहले जो मतभेद बंद कमरों तक सीमित रहते थे, अब वीडियो, बयान और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए खुलकर सामने आ जाते हैं। कई मामलों में जनप्रतिनिधि सार्वजनिक मंचों पर अधिकारियों को फटकारते दिखाई देते हैं, जबकि अधिकारी भी अब अपने पक्ष को संस्थागत मंचों के जरिए सामने रखने लगे हैं। इससे विवाद और ज्यादा चर्चा में आ जाते हैं।

त्वरित समाधान की प्रवृत्ति ने बढ़ाई परेशानी
राजनीतिक और प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि जनप्रतिनिधियों से जनता की अपेक्षाएं पहले की तुलना में काफी बढ़ गई हैं। विधायक और सांसद क्षेत्रीय समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए अधिकारियों पर दबाव बनाते हैं, क्योंकि जनता सीधे उनसे जवाब मांगती है। दूसरी ओर अधिकारी नियम, प्रक्रिया और प्रशासनिक सीमाओं का हवाला देते हैं। यही स्थिति कई बार टकराव का कारण बन जाती है। 

विशेषज्ञों के अनुसार समय के साथ जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों दोनों के व्यवहार में बदलाव आया है। जहां कई जनप्रतिनिधियों में अपने पद को लेकर आक्रामकता दिखाई देती है, वहीं अधिकारियों पर भी संवेदनशीलता और संवाद की कमी के आरोप लगते रहे हैं। सरकार की ओर से समय-समय पर अधिकारियों को प्रोटोकॉल और जनप्रतिनिधियों के साथ व्यवहार संबंधी दिशा-निर्देश दिए जाते हैं, लेकिन इसके बावजूद विवाद सामने आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या प्रदेश में अफसरशाही जनप्रतनिधियों पर भारी पड़ रही है? 

क्या संवाद की कमी बन रहा बड़ा कारण?
अब यह देखा जा रहा है कि जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच संवाद पहले की तुलना में अधिक औपचारिक और तनावपूर्ण होता जा रहा है। कई जनप्रतिनिधि आरोप लगाते हैं कि अधिकारी फोन नहीं उठाते, बैठकों में प्राथमिकता नहीं देते और क्षेत्रीय समस्याओं पर अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाते। वहीं अधिकारियों का पक्ष रहता है कि वह दूसरे कामों में व्यस्त और उनको जानकारी नहीं होने की बात करते हैं? 

जनता के मुद्दों पर नियमों का रोडा? 
विशेषज्ञों के अनुसार कई विवादों की जड़ यही है कि जनप्रतिनिधि जनता के दबाव में तत्काल समाधान चाहते हैं, जबकि प्रशासनिक अधिकारी नियम और प्रक्रिया के तहत काम करने की बात कहते हैं। उदाहरण के तौर पर खाद संकट, योजनाओं के लाभ, सड़क निर्माण या स्थानीय विवाद जैसे मामलों में विधायक तत्काल कार्रवाई चाहते हैं, लेकिन अधिकारी नियम प्रक्रिया का हवाला देते हैं। यही स्थिति कई बार टकराव में बदल जाती है।



सभी को अपना व्यवहार सीमा में रखना चाहिए 
पूर्व आईपीएस अधिकारी शैलेंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों दोनों को अपने व्यवहार और जिम्मेदारियों की मर्यादा समझनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि मंत्री, विधायक या अन्य जनप्रतिनिधियों के फोन और जनहित से जुड़े मामलों को प्राथमिकता के साथ सुना जाए। साथ ही परिस्थितियों के अनुसार संवाद बनाए रखना प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि किसी भी पक्ष को अपने अधिकार क्षेत्र और व्यवहार की सीमा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। कानून और नियमों के दायरे में रहकर ही काम होना चाहिए। अधिकारियों को केवल जनप्रतिनिधियों ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों के फोन भी उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की समस्या नियमों के तहत हल हो सकती है, तो उसका निराकरण समय पर किया जाना चाहिए, ताकि लोगों को बार-बार भटकना न पड़े या उन्हें अपनी समस्या लेकर मंत्री और विधायकों तक जाने की जरूरत न महसूस हो।
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