मध्यप्रदेश में नगरीय निकाय चुनावों के परिणाम के बाद सभी दल अपनी-अपनी समीक्षा में जुट गए हैं। भाजपा की नगर निगम में सात सीटें गंवाने के बाद हार के कारण तलाशे जाने लगे हैं। इसी बीच भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि नगर निगम चुनाव में सूची में गड़बड़ी की वजह से हजारों मतदाताओं द्वारा वोट नहीं डाल पाए, इसे लेकर उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से नाराजगी जताई है।
महासचिव विजयवर्गीय ने एक टीवी चैनल के साक्षात्कार में कहा, 'जो मतदाता सूची बनी, वह हमारे लिए अलार्मिंग थी। जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई करनी चाहिए।' उन्होंने सीएम शिवराज पर सवाल उठाते हुए कहा, 'उनका स्वभाव ही ऐसा है कि वे अफसरों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। अगर इतना विश्वास वे कार्यकर्ताओं पर भी करते तो यह स्थिति नहीं बनती और निश्चित तौर पर हम देखेंगे कि इसमें चूक कहां हुई है? इसमें चुनाव आयोग व अधिकारी जिम्मेदार हैं। यह मामला जितना सीधा दिख रहा है, उतना है नहीं। यह मामला गंभीर है। सीएम को जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई करना चाहिए।'
विजयवर्गीय के पहले सतना जिले के मैहर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी भाजपा संगठन और सरकार पर निशाना साध चुके हैं। उन्होंने नगरीय निकाय चुनावों की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि निर्वाचन आयोग जैसी कोई व्यवस्था नजर ही नहीं आ रही है। अब चुनाव प्रक्रिया ही बंद करवा देना चाहिए और सदन की तरह हां और ना करवाकर प्रमाणपत्र एक दल विशेष के लोगों को दे देना चाहिए।
चुनावों में हार के बाद केंद्र सरकार में खाद्य संस्करण उद्योग मंत्रालय राज्य मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल भी आत्ममंथन की सीख दे चुके हैं। प्रहलाद पटेल ने 17 जुलाई के ट्वीट कर कहा कि दमोह जिले के नगर निकाय चुनावों में किसी भी पार्टी को बहुमत न देने वाला खंडित जनादेश आत्ममंथन की सीख दे रहा है। जिसे मैं शिरोधार्य करता हूं। यह चुनाव परिणाम कम खर्चे वाली चुनावी राजनीति को मजबूती देने वाला है।'
अमर उजाला से चर्चा में मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार आनंद पांडेय कहते है कि कैलाशजी का बयान बहुत हद तक सही है। यह बात बिलकुल सही है कि शिवराज अफसरों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। भाजपा भले ही यह कहती हो कि वह कार्यकर्ताओं की पार्टी है। लेकिन इस चुनाव में पार्टी ने अपने पुराने और मेहनती कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर नए चेहरों को अवसर दिया। इससे पार्टी के एक बहुत बड़े वर्ग में नाराजगी दिखाई दे रही हैं। इसी का परिणाम है कि इन चुनावों में भाजपा के पास से सात निगम हाथ से निकल गए। इनमें कई बड़े और अहम निगम शामिल हैं। इसके अलावा आम आदमी पार्टी की एंट्री प्रदेश में हो गई। कहीं न कहीं इन मुद्दों पर भाजपा को मंथन तो करना होगा। आज कार्यकर्ताओं का एक बहुत बड़ा तबका संगठन के साथ साथ सरकार के काम करने के रवैए से भी नाराज नजर आ रहा है।
भाजपा ने 347 निकायों में से 256 में बढ़त दर्ज की है। लेकिन सात बड़े शहरों में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इन चुनावों में कांग्रेस ने 58 निकाय में बढ़त ली है। भाजपा ने 16 नगर निगमों में से नौ जीत लिए हैं। कांग्रेस के खाते में पांच गए हैं। आम आदमी पार्टी से एक और एक निर्दलीय महापौर बने हैं। पिछली बार शहरों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ किया था, एक भी सीट नहीं जीतने दी थी। विधानसभा चुनाव से पहले बड़े शहरों में जीत कांग्रेस का कम बैक कहा जा रहा है।
वहीं, नगर पालिका की बात करें तो उसमें 76 में से 57 पर भाजपा का कब्जा है। कांग्रेस पहले भी 18 नगर पालिकाएं जीती थी, इस बार भी यही आंकड़ा रहा। निर्दलीयों और तीसरे मोर्चे को इस बार सिर्फ एक नगर पालिका में बहुमत मिला है। इनमें कई सीटें अभी भी फंसी हुई हैं क्योंकि अधिकतर जगह निर्दलीय ही निर्णायक हैं। वे जिसके साथ जाएंगे, अध्यक्ष उसका होगा।
जबकि नगर परिषदों में 255 में से 190 पर भाजपा का कब्जा है, जो पिछली बार से 43 ज्यादा है। यह आंकड़ा इतना बड़ा होने की एक वजह 29 नई नगर परिषदें जुड़ना भी है। इनमें भी अधिकतर पर भाजपा की जीत हुई है। कांग्रेस नगर परिषदों में 60 से घटकर 35 पर आ गई है। निर्दलीय और तीसरे मोर्चे का बहुमत 30 सीटों पर दिखा है, यह पहले 45 हुआ करता था। यहां भी कई सीटें अभी भी फंसी हुई हैं क्योंकि अधिकतर जगह निर्दलीय ही निर्णायक हैं। वे जिसके साथ जाएंगे, अध्यक्ष उसका ही होगा।