मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के श्योपुर जिले के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में 17 सितंबर के कार्यक्रम की तैयारी पूरी गरिमा और उत्साह के साथ संपन्न की जाए। बता दें श्योपुर जिले के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीता प्रबंधन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित तकनीक के अनुसार बसाने का कार्य किया जाएगा। प्रधानमंत्री की यात्रा में मुख्य रूप से कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों के प्रवेश करवाने और कराहल में स्व-सहायता समूह की बहनों के सम्मेलन का कार्यक्रम निर्धारित है। प्रधानमंत्री पुलिंग के जरिए पिंजरा खोलेंगे और चीते बाढ़े में कूद जाएंगे।
पशुओं के टीकाकारण का काम पूरा
नामीबिया से चीतों को लाने से पहले अभयारण्य के आसपास के गाय-भैंस के साथ कुत्तों के वैक्सीनेशन पूरा होने की अधिकारयों ने बैठक में जानकारी दी। नामीबिया से 8 चीते आएंगे। इसमें 5 मेल और 3 फीमेल चीते आ रहे हैं। ये चीतें नामीबिया से छह पिंजरों में विमान से ग्वालियर और फिर हेलीकॉप्टर से कूनो लाए जाएंगे। पहले चीतों को बाढ़े में रखा जाएगा। डेढ़-दो महीने बाद चीतों को जंगल में छोड़ दिया जाएगा।
748 वर्ग किमी में फैला है कूनो-पालपुर पार्क
कूनो-पालपुर नेशनल पार्क 748 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह छह हजार 800 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले खुले वन क्षेत्र का हिस्सा है। चीतों को लाने के बाद उन्हें सॉफ्ट रिलीज में रखा जाएगा। दो से तीन महीने बाड़े में रहेंगे। ताकि वे यहां के वातावरण में ढल जाए। इससे उनकी बेहतर निगरानी भी हो सकेगी। चार से पांच वर्ग किमी के बाड़े को चारों तरफ से फेंसिंग से कवर किया गया है। चीता का सिर छोटा, शरीर पतला और टांगें लंबी होती हैं। यह उसे दौड़ने में रफ्तार पकड़ने में मददगार होती है। चीता 120 किमी की रफ्तार से दौड़ सकता है।
1948 में आखिरी बार देखा गया था चीता
भारत में आखिरी बार चीता 1948 में देखा गया था। इसी वर्ष कोरिया राजा रामनुज सिंहदेव ने तीन चीतों का शिकार किया था। इसके बाद भारत में चीतों को नहीं देखा गया। इसके बाद 1952 में भारत में चीता प्रजाति की समाप्ति मानी गई।
1970 में एशियन चीते लाने की हुई कोशिश
भारत सरकार ने 1970 में एशियन चीतों को ईरान से लाने का प्रयास किया गया था। इसके लिए ईरान की सरकार से बातचीत भी की गई। लेकिन यह पहल सफल नहीं हो सकी। केंद्र सरकार की वर्तमान योजना के अनुसार पांच साल में 50 चीते लाए जाएंगे।