Sehore: 14 जनवरी को शहीदों को पुष्पाजंलि दी जाएगी
- फोटो : अमर उजाला
नगर में सैकड़ाखेड़ी मार्ग पर स्थित शहीदों के समाधि स्थल पर आगामी 14 जनवरी को पुष्पांजलि समारोह का आयोजन किया जाएगा। भारतीय इतिहास की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में शहीद हुए सैनिकों की समाधि स्थल पर प्रात:10.30 बजे पुष्प अर्पित कर याद किया जाएगा।
शहीद सिपाही बहादुर स्मारक निर्माण समिति के अध्यक्ष ओमदीप महामंत्री आनन्द गांधी ने नगर के सभी वर्ग के लोगों से इस दिन बड़ी संख्या में समाधी स्थल पर पहुंचकर अपने स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों का स्मरण करने का आव्हान किया है।
यहां देश की आजादी के संघर्ष में शहीद हुए 356 अनाम शहीदों की शहादत के पर्व के रूप में याद किया जाता है। शहीदों के महान रक्त से सनी यह जगह मालवा के जलियांवाला के रूप में जानी जाती है। दरअसल, 13 अप्रैल 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के ठीक 61 वर्ष पूर्व 14 जनवरी 1858 को सीहोर में 356 क्रांतिकारियों को कर्नल हिरोज ने सिर्फ इसलिए गोलियों से छलनी कर दिया क्योंकि इन देशभक्त शहीदों ने 6 अगस्त 1857 को अंग्रेजी साम्राज्य को ध्वस्त करते हुए तत्कालीन सीहोर कंटोनमेंट में सिपाही बहादुर के नाम से अपनी स्वतंत्र सरकार स्थापित कर ली थी।
इस तरह लिखा मिलता है इतिहास के पन्नों में
ज्ञात इतिहास के अनुसार भोपाल के स्वराज संस्थान संचालनालय ने सिपाही बहादुर सरकार के नाम से किताब का प्रकाशन किया है। पुस्तक में लिखा है, इस समाधि स्थल के चारों तरफ स्थित इसी मैदान में ही 14 जनवरी 1858 को कर्नल हिरोज ने 356 देशभक्तों को पंक्तिबद्ध खड़ा कर गोलियों से छलनी कर दिया था। दरअसल मेरठ की क्रान्ति का असर मध्य भारत में भी आया और मालवा के सीहोर में चूकि अंग्रेज पॉलीटिकल एजेन्ट का मुख्यालय था, लिहाजा यहां के सिपाहियों ने भी विद्रोह कर दिया। लगभग 6 महीने तक सीहोर कंटोनमेंट अग्रेजों से मुक्त रहा। इसी दौरान मध्य भारत के विद्रोहियों को खासकर झांसी की रानी के विद्रोह को कुचलने के लिए बर्बर कर्नल हिरोज को एक बड़े लाव लश्कर के साथ भेजा गया। इन्दौर में सैनिकों के विद्रोह को कुचलने के बाद कर्नल हिरोज 13 जनवरी 1858 को सीहोर पहुंचा और अगले दिन 14 जनवरी 1858 को सीहोर की सीवन नदी के किनारे घेर कर गोलियों से भून डाला। कहते हैं कि सीवन का जल क्रान्तिकारियों के लहू से लाल हो गया और शहीदों की मृत शरीर कई रातों तक वहीं पड़े रहे, बाद में स्थानीय नागरिकों ने इन मृत शरीरों को सीवन नदी के किनारे गड्डे खोदकर दफन किया गया।