1300 वर्ष पुराना है अमरकांठेश्वर महादेव मंदिर।
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Amarkatheshwar Mahadev Temple: पवित्र नगरी अमरकंटक में महाशिवरात्रि पर मेले का आयोजन किया जाता है। जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं और यहां स्थित अमरकठेश्वर महादेव के दर्शन करते हैं। मान्यता है कि अमरकांठेश्वर महादेव के महाशिवरात्रि के दिन दर्शन और पूजन करने से सभी समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है और कष्ट भी दूर होते हैं।
स्वयंभू शिवलिंग है अमरकठेश्वर महादेव
मां नर्मदा मंदिर परिसर में ही अमरकांठेश्वर महादेव शिवलिंग स्थापित है, जिसके बारे में बताया जाता है कि यह स्वयंभू शिवलिंग है। 1300 वर्ष पूर्व आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा शिवलिंग की पूजा अर्चना प्रारंभ की गई थी। साथ ही उन्होंने यहां पर जलहरी का निर्माण कराने के साथ माता गौरी की स्थापना भी कराई थी।
कैलाश से भी ज्यादा प्रिय था भगवान शिव को मैंकल पर्वत
मां नर्मदा मंदिर के पुजारी आचार्य धनेश द्विवेदी ने बताया कि अमरकंटक का मैंकल पर्वत भगवान भोलेनाथ को कैलाश पर्वत से भी ज्यादा प्रिय था, यहां उन्होंने 87000 वर्ष तक तपस्या की थी। उनके दोनों पुत्र श्री गणेश और कार्तिकेय का जन्म भी यहीं हुआ था। पुराणों में महाशिवरात्रि पर अमरकंटक आकर नर्मदा स्नान करते हुए अमरकांठेश्वर महादेव की पूजा अर्चना का फल स्वर्ग से भी ज्यादा बताया गया है।
सैकड़ों वर्ष से लग रहा है मेला
आचार्य पंडित धनेश द्विवेदी ने बताया कि अमरकंटक में महाशिवरात्रि पर्व पर मेले का आयोजन सैकड़ों वर्ष पूर्व से किया जा रहा है। पूर्व के समय में यहां महाशिवरात्रि पर राजा और रानी दोनों ही आया करते थे। जिसके लिए यहां पर दो मैदान भी बने हुए हैं, जिन्हें रानी और राजा पड़ाव के नाम से जाना जाता है। यहां मेले में इलाहाबाद बनारस बलिया बिहार से दुकानदार पहुंचते और एक महीने तक यहां मेले लगता था। तब आवा गमन के साधन में नहीं थे, मैंकल पर्वत पर कड़ी मेहनत के बाद ही लोग पहुंचते थे।