महाशिवरात्रि 2018: मोक्षदायिनी उज्जैन के महाकालेश्वर समेत मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शिव मंदिर

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल

महाकालेश्वर

महाकालेश्वर  भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में है। इस नगरी का पौराणिक और धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व जगजाहिर है। ऐसी मान्यता है कि महाकाल जहां स्थित हैं वह धरती का नाभि स्थल है या पृथ्वी का केंद्र है। पुराणों, महाभारत और महाकवि कालिदास की रचनाओं में भी इस मंदिर का अत्यंत सुंदर उल्लेख मिलता है।  प्राचीन नगर उज्जैन मालवा क्षेत्र में क्षिप्रा नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित है। प्राचीन समय में इसे उज्जयिनी कहा जाता था। उज्जैन हिन्दू धर्म की सात पवित्र तथा मोक्षदायिनी नगरियों में से एक है। अन्य छह मोक्षदायिनी नगरियां हैं – हरिद्वार, अयोध्या, वाराणसी, मथुरा, द्वारका और कांचीपुरम। यहाँ हिन्दुओं का पवित्र उत्सव कुम्भ मेला हर 12 वर्षों में एक बार लगता है। 

जहां ओमकार स्वरूप में विद्यमान हैं महादेव

ओम्कारेश्वर

ओम्कारेश्वर  मध्य प्रदेश के इंदौर से 77 किलोमीटर दूर स्थित है ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग। ओम्कारेश्वर का शिवमंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक माना जाता है। भगवान शिव यहां ओमकार स्वरूप में विद्यमान हैं और मां नर्मदा स्वयं ॐ के आकार में बहती है। यह एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो नर्मदा नदी के मध्य ओमकार पर्वत पर स्थित है। मान्यता है कि भगवान शिव प्रतिदिन तीनों लोकों में भ्रमण के बाद यहां विश्राम करते हैं। इसलिए हर रोज यहां भगवान शिव की शयन आरती की जाती है और श्रद्धालु खासतौर पर शयन दर्शन के लिए यहां आते हैं। हिंदुओं में सभी तीर्थों के दर्शन के बाद ओम्कारेश्वर के दर्शन और पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। तीर्थ यात्री सभी तीर्थों का जल लाकर यहां ओम्कारेश्वर महादेव का अभिषेक करते हैं, तभी सारे तीर्थ पूर्ण माने जाते हैं। 

उत्तर भारत का 'सोमनाथ'

भोजेश्वर महादेव मंदिर

भोजेश्वर मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भोजेश्वर मंदिर को उत्तर भारत का 'सोमनाथ' भी कहा जाता है। भगवान शिव के इस मंदिर में आज भी अधूरा शिवलिंग स्थापित है। भोजेश्वर या भोजपुर नाम से मशहूर इस मंदिर की स्थापना परमार वंश के राजा भोज ने करवाई थी। यह मंदिर वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। यह मंदिर बेहद विशाल है और इसके चबूतरे की लंबाई ही करीब 35 मीटर है।  इस मंदिर की सबसे खास बात यहां स्थापित शिवलिंग है जिसका निर्माण एक ही पत्थर से हुआ है। दूसरी बात जो इस मंदिर को खास बनाती है वह है इसका अधूरापन। मान्यताओं के मुताबिक इस मंदिर का निर्माण एक ही दिन में पूरा होना था। लेकिन मंदिर निर्माण कार्य पूरा होने से पहले सूर्योदय हो गया और निर्माण कार्य बंद कर दिया गया। इसलिए यह मंदिर आज भी अधूरा ही है।  

भस्मासुर से बचकर यहां आए थे भोलेनाथ

जटाशंकर महादेव मंदिर

जटाशंकर महादेव  पंचमढ़ी स्थित जटाशंकर महादेव मंदिर वह जगह है जहां भस्मासुर से बचने के लिए भगवान भोलेनाथ ने शरण ली थी। पौराणिक कथाओं के मुताबिक भोलेनाथ ने भस्मासुर की कड़ी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे मनचाहा वरदान दे दिया। भस्मासुर ने वरदान मांग लिया कि वह जिसके सिर पर हाथ रखे वह भस्म हो जाए। वरदान मिलते ही भस्मासुर ने वरदान की ताकत को आजमाने के लिए भोलेनाथ के ही पीछे पड़ गया। भस्मासुर से बचने के लिए महादेव ने जिन कंदराओं और गुफाओं में शरण ली वह स्थान पंचमढ़ी में हैं। इसलिए यहां महादेव के कई मंदिर हैं।  मान्यता है कि पंचमढ़ी पांडवों की वजह से भी जानी जाती है। वनवास पूरा करने के बाद पांडवों ने एक वर्ष का अज्ञात यहां भी बिताया था। उनकी पांच कुटिया या मढ़ी या गुफाएं थी जिसकी वजह से इस जगह का नाम पंचमढ़ी पड़ा।
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